कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट में अगली सुनवाई 15 मई को, मुस्लिम पक्ष की संशोधन अर्जी पर विचार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार, 10 अप्रैल को मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि मंदिर और शाही ईदगाह मस्जिद से जुड़े बहुचर्चित भूमि विवाद मामले की सुनवाई जारी रखी। मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस अविनीश सक्सेना ने मुस्लिम पक्ष द्वारा दायर एक नई संशोधन अर्जी (amendment application) पर विचार करने के बाद अगली सुनवाई के लिए 15 मई की तारीख तय की है।

शुक्रवार की कार्यवाही मुख्य रूप से मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश किए गए संशोधन आवेदन पर केंद्रित रही। यह प्रक्रियात्मक कदम ऐसे समय में आया है जब दोनों पक्ष 18 समेकित मुकदमों (consolidated suits) से जुड़ी एक जटिल कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। संशोधन के संबंध में प्रारंभिक दलीलें सुनने के बाद, हाईकोर्ट ने आवेदन के कानूनी पहलुओं की गहराई से जांच करने के लिए मामले को मई के मध्य तक के लिए स्थगित कर दिया।

यह दीर्घकालिक विवाद मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल के दौरान निर्मित शाही ईदगाह मस्जिद को लेकर है। हिंदू पक्ष का तर्क है कि इस मस्जिद का निर्माण उस मंदिर को ढहाने के बाद किया गया था, जो भगवान कृष्ण की जन्मस्थली पर स्थित था।

हिंदू पक्ष ने इस मामले में कुल 18 अलग-अलग मुकदमे दायर किए हैं, जिनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगें की गई हैं:

  • विवादित भूमि का भौतिक कब्जा।
  • शाही ईदगाह मस्जिद के ढांचे को हटाना।
  • मंदिर का “पुनरुद्धार”।
  • स्थल पर किसी भी तरह के बदलाव को रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा।
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इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ 1 अगस्त, 2024 को आया था, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुकदमों की पोषणीयता (maintainability) को चुनौती देने वाली मुस्लिम पक्ष की आपत्तियों को खारिज कर दिया था।

उस ऐतिहासिक आदेश में, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि हिंदू उपासकों द्वारा दायर ये मुकदमे कई महत्वपूर्ण कानूनों के तहत बाधित नहीं हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • परिसीमा अधिनियम (Limitation Act)
  • वक्फ अधिनियम (Waqf Act)
  • उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991, जो सामान्य तौर पर 15 अगस्त, 1947 को अस्तित्व में रहे किसी भी धार्मिक ढांचे के स्वरूप को बदलने पर रोक लगाता है।
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कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि ये कानून वर्तमान मुकदमों के निस्तारण में बाधा नहीं बनते। इस फैसले ने मथुरा स्थल के इतिहास और स्वामित्व से जुड़े दावों की विस्तृत न्यायिक जांच का मार्ग प्रशस्त किया था।

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