वसीयत में बिना सत्यापन किए गए बदलाव भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 71 के तहत अमान्य: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने एक वसीयतकर्ता की विधवा और दो बेटों द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने जिला अदालत के उस फैसले की पुष्टि की है जिसमें एक असत्यापित बदलाव को नजरअंदाज करते हुए बेटी के पक्ष में वसीयत की प्रोबेट (Probate) मंजूर की गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 71 के अनुसार, किसी भी साधारण वसीयत के निष्पादन के बाद उसमें किया गया कोई भी बदलाव तब तक प्रभावी नहीं होता जब तक कि उसे उसी तरह से प्रमाणित न किया गया हो जैसे वसीयत को किया जाता है।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद स्वर्गीय कुन्हिकृष्णा कुरुप द्वारा 27 जुलाई, 1993 को निष्पादित वसीयत से जुड़ा है। इस दस्तावेज को उसी दिन जिला रजिस्ट्रार के पास जमा किया गया था। वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद, 6 दिसंबर, 2006 को उनके बेटे (द्वितीय अपीलकर्ता) की उपस्थिति में वसीयत खोली गई और पंजीकृत की गई।

शुरुआत में पहली प्रतिवादी (बेटी/वादी) को भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही से मिली जानकारी के आधार पर लगा कि संपत्ति सभी बच्चों के नाम की गई है। हालांकि, 2013 में सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत वसीयत की प्रति प्राप्त करने पर उसे दूसरे पृष्ठ पर एक स्पष्ट सुधार मिला। वसीयत में शब्द “बेटी” (मकल) को बदलकर “बच्चे” (मक्कल) कर दिया गया था। इसके बाद उसने जिला अदालत का दरवाजा खटखटाया और मांग की कि संपत्ति को विशेष रूप से उसके पक्ष में घोषित किया जाए और छेड़छाड़ किए गए हिस्से को हटाकर प्रोबेट जारी किया जाए। जिला अदालत ने इस कार्यवाही को सूट (O.S. No. 7/2015) में बदल दिया और बेटी के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसे अब हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं (विधवा और दो बेटे) का तर्क था कि वसीयतकर्ता का इरादा सभी बच्चों को लाभान्वित करना था और वसीयत खोलने के बाद कोई छेड़छाड़ नहीं की गई। उन्होंने तर्क दिया कि प्रोबेट कार्यवाही का दायरा केवल वसीयत की प्रमाणिकता तक सीमित है और जिला अदालत ने एक नियमित दीवानी मुकदमे की तरह “गहरा विश्लेषण” करके गलती की है। उन्होंने यह भी कहा कि वसीयत में मां को घर में रहने का अधिकार दिया गया था, जो यह दर्शाता है कि वसीयत केवल बेटी के लिए नहीं थी।

दूसरी ओर, बेटी (प्रतिवादी) ने तर्क दिया कि यदि वसीयतकर्ता का उद्देश्य संपत्ति को सभी बच्चों को देना होता, तो वसीयत बनाने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी, क्योंकि सामान्य उत्तराधिकार नियमों के तहत संपत्ति वैसे ही सभी को मिल जाती। उसने आरोप लगाया कि यह सुधार स्पष्ट रूप से हेरफेर था, जिसे 2006 में पंजीकरण के बाद वसीयत को दोबारा जमा करने में हुई देरी की मदद से अंजाम दिया गया।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस एस. मनु की पीठ ने पाया कि दूसरे पृष्ठ की 8वीं पंक्ति में किया गया बदलाव “नग्न आंखों से भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।” कोर्ट ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 71 का हवाला देते हुए कहा:

“किसी भी साधारण वसीयत के निष्पादन के बाद उसमें किया गया कोई भी मिटाया गया हिस्सा, पंक्तियों के बीच लिखा गया शब्द या अन्य बदलाव तब तक प्रभावी नहीं होगा… जब तक कि ऐसा बदलाव उसी रीति से निष्पादित न किया गया हो जैसा कि वसीयत के निष्पादन के लिए आवश्यक है।”

हाईकोर्ट ने नोट किया कि वसीयत की धारा 71 के प्रावधानों के अनुसार बदलाव के पास वसीयतकर्ता के हस्ताक्षर या गवाहों का सत्यापन नहीं था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि सब-रजिस्ट्रार (DW5), जिन्होंने 2006 में वसीयत को रजिस्टर में कॉपी किया था, ने गवाही दी कि जिस समय उन्होंने मूल वसीयत की नकल तैयार की थी, उस समय उसमें कोई सुधार नहीं था।

प्रोबेट कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर जस्टिस मनु ने टिप्पणी की:

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“भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 71 के प्रावधानों के अनुसार किसी बदलाव या सुधार की जांच करना और उसके प्रभाव का निर्णय लेना, प्रोबेट कोर्ट की जांच के दायरे में आने वाला विषय है। इस तरह के अभ्यास को वसीयत के तहत अधिकारों के परीक्षण के समान नहीं माना जा सकता है।”

कोर्ट ने वसीयत खोलने (6 दिसंबर 2006) और उसे दोबारा जमा करने (13 दिसंबर 2006) के बीच के समय के अंतर पर भी सवाल उठाया और निष्कर्ष निकाला कि “हेरफेर की सुविधा के लिए ही दोबारा जमा करने में देरी की गई थी।”

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न्यायिक दृष्टांत और कानूनी सिद्धांत

निर्णय में वसीयत में बदलाव से संबंधित कई महत्वपूर्ण मामलों का संदर्भ दिया गया:

  • दयानंदी बनाम रुक्मा डी. सुवर्णा [(2012) 1 SCC 510]: इसमें स्पष्ट किया गया कि उचित निष्पादन के बिना किए गए बदलावों का कोई कानूनी प्रभाव नहीं होता।
  • सुरेंद्र कृष्ण मंडल बनाम रानी दासी [1920 SCC OnLine Cal 52]: यह सिद्धांत स्थापित किया गया कि कानून यह मानकर चलता है कि बिना सत्यापन वाले बदलाव वसीयत के निष्पादन के बाद किए गए हैं।
  • ईश्वरदेव नारायण सिंह बनाम कामता देवी [(1953) 1 SCC 295]: इसमें कहा गया कि प्रोबेट कोर्ट का संबंध केवल इस बात से है कि दस्तावेज का निष्पादन और सत्यापन कानून के अनुसार हुआ है या नहीं।

फैसला

हाईकोर्ट ने अपील में कोई योग्यता नहीं पाई और अतिरिक्त जिला न्यायाधीश-V, कोझिकोड के फैसले की पुष्टि की। कोर्ट ने कहा कि अनधिकृत बदलावों को हटाकर वसीयतकर्ता के वास्तविक इरादे को प्रभावी बनाने के लिए प्रोबेट प्रदान किया जा सकता है। इसी के साथ अपील को खर्च के साथ खारिज कर दिया गया।

मामले का विवरण:

केस टाइटल: पी. लक्ष्मिकुट्टी अम्मा और अन्य बनाम वी.के. इंदिरा और अन्य

केस नंबर: MFA (भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम) नंबर 18/2019

पीठ: जस्टिस एस. मनु

दिनांक: 10 अप्रैल, 2026

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