अवैध अंग तस्करी मामला: केरल हाईकोर्ट ने मेडिकल टूरिज्म संचालक की जमानत अर्जी खारिज की

केरल हाईकोर्ट ने जाली दस्तावेजों के सहारे गैरकानूनी तरीके से मानव अंगों का प्रत्यारोपण कराने के आरोपी 53 वर्षीय मेडिकल टूरिज्म ऑपरेटर की जमानत याचिका खारिज कर दी है। कल्लाथरास मेडिकल टूरिज्म प्राइवेट लिमिटेड के संचालक मोहम्मद नजीब कल्लात्रा को राहत देने से इनकार करते हुए हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और कहा कि मानव अंगों का अवैध व्यापार समाज और पूरी मानवता के खिलाफ एक गंभीर अपराध है।

जस्टिस कौसर एडप्पागथ की एकल पीठ ने 11 अगस्त को अपने आदेश में कहा कि अवैध अंग तस्करी न केवल आर्थिक रूप से कमजोर लोगों का शोषण करती है, बल्कि यह वैध और परोपकारी अंगदान कार्यक्रमों के प्रति जनता के भरोसे को भी कमजोर करती है। अदालत ने चिंता व्यक्त की कि इस तरह की गैरकानूनी गतिविधियां स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े पेशेवरों और चिकित्सा संस्थानों की साख को भारी नुकसान पहुंचाती हैं।

फर्जी दस्तावेजों के जरिए किडनी ट्रांसप्लांट का आरोप

अभियोजन पक्ष के अनुसार, कल्लात्रा ने अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर सरकारी जिला अस्पतालों के डॉक्टरों के लेटरहेड, आधिकारिक सील और हस्ताक्षरों की जालसाजी की। इन फर्जी प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल अवैध प्रत्यारोपण प्रक्रियाओं को अंजाम देने के लिए किया जा रहा था।

जांच में सामने आया कि 8 अक्टूबर 2025 को एर्नाकुलम के लेकशोर अस्पताल में एक व्यक्ति की किडनी मुस्तफा नाम के मरीज को प्रत्यारोपित की गई थी। इस ट्रांसप्लांट के लिए कल्लात्रा द्वारा तैयार जाली कागजातों का उपयोग किया गया। मामले का खुलासा होने के बाद आरोपी को 8 मई को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।

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दस लाख रुपये की डील और नौ लाख का भुगतान

मामले की जांच के दौरान सामने आए बयानों से पता चला कि आरोपी किस तरह लाचार लोगों की मजबूरी का फायदा उठाता था। किडनी दाता के पति के बयान के अनुसार, कल्लात्रा ने मुस्तफा के लिए ओ-पॉजिटिव (O+) किडनी की तत्काल जरूरत बताते हुए 10 लाख रुपये देने की बात कही थी। हालांकि, प्रशासनिक और कागजी खर्चों के नाम पर कटौती के बाद पीड़ित परिवार को 9 लाख रुपये ही दिए गए।

बचाव पक्ष का पक्ष और हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान कल्लात्रा के वकील शिराज अब्दुल्ला एम एस ने दलील दी कि उनका मुवक्किल पूरी तरह निर्दोष है और उसे मामले में गलत तरीके से घसीटा जा रहा है। बचाव पक्ष का कहना था कि कल्लात्रा की कंपनी का काम सिर्फ एर्नाकुलम के अस्पतालों में आने वाले मरीजों को रहने की जगह, परिवहन और शव प्रबंधन सेवाएं देना था, और उसका अंग प्रत्यारोपण या कूटरचना से कोई संबंध नहीं है। दूसरी तरफ, लोक अभियोजक ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए इसे एक संगठित आपराधिक कृत्य बताया।

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हाईकोर्ट ने आरोपी के आपराधिक इतिहास और पूर्व में इसी तरह के मामलों में उसकी संलिप्तता का संज्ञान लेते हुए जमानत देने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि गरीबी से जूझ रहे लोगों को कम पैसों का लालच देकर अंग बेचने के लिए फुसलाया जाता है, जिसके बाद उन्हें बिना किसी उचित चिकित्सकीय देखभाल के जीवनभर गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझना पड़ता है।

अंतरराज्यीय नेटवर्क की व्यापक जांच जारी

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जस्टिस एडप्पागथ ने स्पष्ट किया कि पुलिस इस पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही है। जांच एजेंसी इस साजिश में शामिल अन्य बिचौलियों, सहायकों, वित्तीय लाभार्थियों, संदिग्ध अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों की पहचान करने में जुटी है। इसके साथ ही इस संगठित गिरोह के अंतरराज्यीय संपर्कों का पता लगाने के लिए भी विस्तृत जांच जारी है।

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