केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत किसी भी कार्यवाही में पीड़ित या उनके आश्रितों को सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित किया गया आदेश कानून की नजर में “अस्तित्वहीन” (non-est) है। जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने एक मॉब लिंचिंग मामले में आठ आरोपियों को दी गई नियमित जमानत को रद्द करते हुए इसे निचली अदालत की एक “गंभीर चूक” करार दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला (वाल्यार पुलिस स्टेशन अपराध संख्या 975/2025) राम नारायण बघेल की मृत्यु से जुड़ा है, जो झारखंड के निवासी थे और घटना से महज चार दिन पहले काम की तलाश में केरल आए थे। 17 दिसंबर, 2025 को आरोपियों की भीड़ द्वारा उन पर कथित तौर पर “मॉब लिंचिंग” के तहत क्रूर हमला किया गया था।
जांच के दौरान आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 103(2) (जो विशेष रूप से भीड़ द्वारा की गई हत्या से संबंधित है) और SC/ST (POA) एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत आरोप लगाए गए थे।
पालक्काड़ स्थित विशेष अदालत (SC/ST एक्ट) ने जनवरी और फरवरी 2026 में आठ आरोपियों (प्रतिवादी संख्या 1 से 8) को नियमित जमानत दे दी थी। विशेष न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा था कि हालांकि घटना “हृदयविदारक और चौंकाने वाली” है, लेकिन जांच पूरी करने के लिए आरोपियों को अनिश्चित काल तक हिरासत में रखना उचित नहीं है। निचली अदालत ने यह भी माना था कि “शिकायतकर्ता की दलीलें सुनने की आवश्यकता नहीं है” क्योंकि यह संभावना कम है कि आरोपियों को हमले के समय मृतक की जाति की जानकारी थी।
पक्षों की दलीलें
राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ लोक अभियोजक विपिन नारायण ने इस जमानत के खिलाफ अपील दायर की। अभियोजन पक्ष का तर्क था कि विशेष न्यायाधीश ने जांच के बेहद शुरुआती चरण में जमानत दी, जिससे मॉब लिंचिंग जैसे गंभीर मामले की निष्पक्ष जांच प्रभावित हुई। राज्य ने कई आरोपियों के आपराधिक इतिहास का हवाला दिया और इस बात पर जोर दिया कि SC/ST एक्ट की धारा 15A(3) के तहत पीड़ित को सुनवाई का नोटिस देना अनिवार्य था, जिसका पूर्ण उल्लंघन किया गया।
पीड़ित के भाई (प्रतिवादी संख्या 9) ने राज्य की अपील का समर्थन करते हुए कहा कि कानून के अनिवार्य प्रावधान के बावजूद पीड़ित के आश्रितों को कोई नोटिस जारी नहीं किया गया था।
आरोपियों के वकील ने जमानत रद्द करने का विरोध करते हुए कहा कि निचली अदालत ने जमानत देने के पर्याप्त कारण बताए थे। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि आरोपियों पर दर्ज पुराने मामले वर्तमान घटना से संबंधित नहीं हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस बदरुद्दीन ने पीड़ित के सुनवाई के अधिकार की अनदेखी करने के निचली अदालत के फैसले की कड़ी आलोचना की। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि SC/ST (POA) अधिनियम की धारा 15A(3) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि पीड़ित या उसके आश्रित को जमानत सहित किसी भी अदालती कार्यवाही का उचित और समय पर नोटिस प्राप्त करने का अधिकार ‘होगा’ (shall)।
विशेष न्यायाधीश के उस तर्क को खारिज करते हुए, जिसमें उन्होंने कहा था कि प्रथम दृष्टया यह एक्ट लागू नहीं होता, हाईकोर्ट ने कहा:
“पीड़ित या उसके आश्रित को नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए बिना, कोई भी विशेष अदालत या कोई अन्य अदालत SC/ST (POA) एक्ट, 2018 के तहत किसी भी कार्यवाही में निर्णय लेने के लिए अधिकृत नहीं है।”
हाईकोर्ट ने पाया कि विशेष न्यायाधीश ने “लापरवाही और विचारहीनता” से काम किया और वैधानिक प्रावधानों की अनदेखी करते हुए यांत्रिक तरीके से निष्कर्ष निकाला। मॉब लिंचिंग की गंभीरता पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के तहसीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ मामले का उल्लेख करते हुए कहा:
“लिंचिंग कानून के शासन और संविधान के उच्च मूल्यों का अपमान है… कानून की रक्षा के बहाने किए जाने वाले इन न्यायेतर प्रयासों को शुरुआत में ही कुचलना होगा; अन्यथा यह अराजकता और अधर्म को जन्म देगा।”
हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि निचली अदालत SC/ST एक्ट की धारा 8(c) के तहत जाति की पहचान के ‘ज्ञान’ की वैधानिक धारणा और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 187 के तहत पुलिस हिरासत के प्रावधानों पर विचार करने में विफल रही।
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपियों को जमानत देने वाले आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने तत्काल प्रभाव से आरोपियों के बेल बॉन्ड रद्द करने और उन्हें तीन दिनों के भीतर संबंधित अदालत में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
“अभियोजन पक्ष द्वारा दी गई जमानत रद्दीकरण की याचिका मामले के तथ्यों के आधार पर जायज है… पीड़ित के आश्रित को सुने बिना पारित किया गया विवादित आदेश कानून की नजर में अस्तित्वहीन है और इसलिए इसे रद्द किया जाता है।”
हाईकोर्ट ने आरोपियों को आत्मसमर्पण के बाद नई जमानत याचिका दायर करने की छूट दी है। हालांकि, कोर्ट ने निर्देश दिया कि विशेष न्यायाधीश ऐसी याचिकाओं पर SC/ST एक्ट की धारा 15A(3) के तहत पीड़ित के आश्रित को सुनवाई का अनिवार्य अवसर देने के बाद ही गुण-दोष के आधार पर निर्णय लें।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: केरल राज्य बनाम अनु और अन्य
- केस नंबर: CRL.A NO. 258 OF 2026
- बेंच: जस्टिस ए. बदरुद्दीन
- फैसले की तारीख: 19 मार्च, 2026

