केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ईसाई समुदाय के ब्रेथ्रन संप्रदाय का प्रार्थना हॉल राज्य के शराब लाइसेंसिंग नियमों के तहत ‘चर्च’ की श्रेणी में आता है। इस निर्णय के साथ ही हाईकोर्ट ने एक पास के होटल द्वारा बार लाइसेंस मांगे जाने की याचिका को खारिज कर दिया, जो असेंबली हॉल से महज 80 मीटर की दूरी पर स्थित है।
जस्टिस के नटराजन और जस्टिस जॉनसन जॉन की डिविजन बेंच ने 17 अगस्त को यह फैसला सुनाते हुए एम/एस होटल पैलेस इन, अंगमाली और उसके मैनेजिंग पार्टनर की अपील को खारिज कर दिया। अपीलकर्ताओं ने 10 सितंबर 2025 के सिंगल जज के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें अंगमाली टाउन ब्रेथ्रन असेंबली हॉल को केरल फॉरेन लिकर रूल्स, 1953 के तहत गिरजाघर यानी ‘चर्च’ के रूप में मान्यता दी गई थी।
दूरी के नियम और कानूनी प्रावधान
केरल फॉरेन लिकर रूल्स, 1953 के नियम 13(3) के अनुसार, चर्च को एक ऐसे सार्वजनिक स्थल के रूप में परिभाषित किया गया है जहां ईसाई प्रार्थना के लिए एकत्र होते हैं। यह कानून धार्मिक स्थलों (चर्च, मंदिर, मस्जिद), शैक्षणिक संस्थानों और कब्रिस्तानों से शराब की दुकानों व बार के बीच एक निश्चित दूरी बनाए रखना अनिवार्य बनाता है।
नियमों के मुताबिक, थ्री-स्टार होटलों के लिए प्रार्थना स्थल से कम से कम 200 मीटर की दूरी तय की गई है, जबकि फोर-स्टार, फाइव-स्टार, फाइव-स्टार डीलक्स और हेरिटेज श्रेणी के होटलों के लिए यह दूरी 50 मीटर है। हालांकि, अदालत के फैसले में होटल पैलेस इन की स्टार रेटिंग या श्रेणी का अलग से उल्लेख नहीं किया गया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन दूरी संबंधी नियमों का मुख्य उद्देश्य धार्मिक सभाओं और शिक्षण संस्थानों में किसी भी प्रकार के विघ्न या व्यवधान को रोकना है।
साल 2008 से चल रहा है विवाद
यह कानूनी विवाद साल 2008 में तब शुरू हुआ था, जब टाउन ब्रेथ्रन असेंबली को पता चला कि होटल पैलेस इन उनके असेंबली हॉल से लगभग 80 मीटर की दूरी पर एक बार होटल शुरू करने की योजना बना रहा है। इस पर असेंबली ने आबकारी अधिकारियों के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज कराई और तर्क दिया कि इतनी कम दूरी पर बार खोलने से दूरी के नियमों का उल्लंघन होगा।
शिकायत पर सुनवाई करते हुए राज्य के आबकारी आयुक्त ने 7 दिसंबर 2008 को फैसला सुनाया कि ब्रेथ्रन असेंबली हॉल नियमानुसार चर्च के दायरे में आता है, और इसके आधार पर होटल के बार लाइसेंस आवेदन को खारिज कर दिया गया। इसके बाद होटल प्रबंधन ने पुनर्विचार याचिका दायर की, जिससे यह लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हुई।
सार्वजनिक प्रार्थना स्थल की व्याख्या
अपनी अपील में होटल प्रबंधन ने तर्क दिया था कि यह असेंबली हॉल केवल धार्मिक पूजा का केंद्र नहीं है, बल्कि इसका उपयोग ब्रेथ्रन मिशन की विभिन्न संगठनात्मक गतिविधियों के लिए भी किया जाता है। इसलिए इसे सार्वजनिक स्थान नहीं माना जा सकता। होटल ने यह भी कहा कि भले ही आम ईसाइयों के लिए प्रार्थना खुली है, लेकिन पवित्र संस्कार (होली सेक्रामेंट) में भाग लेने की अनुमति केवल ब्रेथ्रन संप्रदाय के अनुयायियों को ही है।
हाईकोर्ट ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि यह समूह एक ईसाई धार्मिक संस्था है जो नियमित रूप से प्रार्थना सभाएं आयोजित करती है। पीठ ने ध्यान दिलाया कि इस हॉल में पूजा-अर्चना के अलावा बाइबल अध्ययन, संडे स्कूल और पुरुषों व महिलाओं के लिए अलग-अलग प्रार्थना समूह की गतिविधियां नियमित रूप से संचालित होती हैं।
सार्वजनिक स्थल की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के ‘गौरव जैन बनाम भारत संघ’ मामले के नजीर का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी स्थान को सार्वजनिक स्थान मानने के लिए उसका सरकारी या सार्वजनिक स्वामित्व में होना आवश्यक नहीं है, बल्कि केवल यह पर्याप्त है कि वहां आम जनता की पहुंच हो।
समानता और कानूनी अधिकार के तर्क खारिज
होटल ने यह दलील भी दी थी कि असेंबली ने 200 मीटर के भीतर चल रहे एक अन्य बार और 400 मीटर के भीतर स्थित एक ताड़ी की दुकान का कोई विरोध नहीं किया था। हाईकोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि अन्य शराब विक्रेताओं की मौजूदगी का इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि असेंबली हॉल चर्च है या नहीं। कोई भी पक्ष समानता (पैरिटी) के आधार पर लाइसेंस का दावा नहीं कर सकता।
इसके अतिरिक्त, होटल ने यह सवाल भी उठाया था कि टाउन ब्रेथ्रन असेंबली एक पंजीकृत संस्था नहीं है और उसने अपना संविधान जमा नहीं किया है, इसलिए उसे याचिका दायर करने का कानूनी अधिकार (लोकस स्टैंडी) नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा 2023 के डिविजन बेंच के फैसले से पहले ही तय हो चुका था, जिसमें सिंगल जज को केवल यह निर्धारित करने का निर्देश दिया गया था कि क्या यह परिसर नियम 13(3) के तहत चर्च की परिभाषा में आता है या नहीं। चूंकि 2023 का वह फैसला अंतिम हो चुका था, इसलिए असेंबली के कानूनी ढांचे या स्वामित्व की जांच करना अनावश्यक है। मुख्य बात केवल यह है कि क्या यह स्थान एक ऐसा सार्वजनिक स्थल है जहां ईसाई प्रार्थना करते हैं, जो साक्ष्यों से पूरी तरह साबित होता है।

