केरल हाईकोर्ट ने साल 2013 के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए अपनी पत्नी की हत्या के आरोप में उम्रकैद काट रहे पति बालदास को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि पुलिस द्वारा बरामद किया गया सड़-गल चुका शव आरोपी की पत्नी का ही था। इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने मंजेरी स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-1 की अदालत द्वारा बालदास को सुनाई गई दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को निरस्त कर दिया।
जस्टिस राजा विजयराघवन वी और जस्टिस के वी जयकुमार की खंडपीठ ने बालदास की अपील को स्वीकार करते हुए उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया, यदि किसी अन्य मामले में उनकी हिरासत की आवश्यकता न हो।
डीएनए जांच और पहचान में गंभीर लापरवाही
मामले की सुनवाई करते समय हाईकोर्ट ने जांच प्रक्रिया की बुनियादी कमियों को रेखांकित किया। अदालत ने पाया कि जब शव बरामद किया गया था, तब वह काफी क्षत-विक्षत अवस्था में था। इसके बावजूद पुलिस ने मृतक की सही पहचान के लिए कोई डीएनए परीक्षण नहीं कराया।
इसके अतिरिक्त, जांच अधिकारियों ने शव की पहचान सुनिश्चित करने के लिए न तो महिला के पिता को बुलाया और न ही उस निजी फाइनेंसर को, जो इस दंपति को अच्छी तरह जानता था। पीठ ने कहा कि मृतका की पहचान न हो पाना अभियोजन पक्ष के दावे में एक बड़ा और अनसुलझा पहलू बना रहा।
परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की टूटी कड़ियां
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि चिकित्सकीय रिपोर्ट और परिस्थितियों से यह संकेत जरूर मिलता है कि मृत्यु गैर-कुदरती या हत्या थी, लेकिन अभियोजन पक्ष का यह कानूनी दायित्व था कि वह स्वतंत्र रूप से साबित करे कि मरने वाली महिला ही आरोपी की पत्नी लक्ष्मी थी।
अदालत ने यह भी नोट किया कि आरोपी के पास से मृतका के सोने के आभूषण बरामद होने के दावे को साबित करने के लिए भी कोई विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं किया गया।
पीठ ने कहा कि पूर्णतः परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर टिके मुकदमों में इस प्रकार की बड़ी चूक अभियोजन के पूरे मामले को ध्वस्त कर देती है। साक्ष्यों की श्रृंखला ऐसी नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि सभी मानवीय संभावनाओं के तहत यह अपराध केवल और केवल आरोपी द्वारा ही किया गया था। कानूनी साक्ष्यों की इसी कमी के कारण हाईकोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।

