बिना वैध ड्राइविंग लाइसेंस चला रहा था पति, इसलिए बीमा कंपनी नहीं देगी मुआवजा; कर्नाटक हाईकोर्ट ने बच्चों की अपील खारिज की

कर्नाटक हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें एक व्यक्ति को अपनी पत्नी की सड़क दुर्घटना में हुई मौत के लिए अपने दो बच्चों को 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि दुर्घटना के समय चालक के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था और ऐसे मामले में बीमा कंपनी को पहले मुआवजा देकर बाद में राशि वसूलने (Pay and Recover) का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता।

24 जुलाई के आदेश में जस्टिस शिवशंकर अमरन्नावर ने पवन और पवित्रा एच एम की अपील खारिज कर दी। दोनों ने मुआवजे की राशि बढ़ाने के साथ यह भी मांग की थी कि रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी पहले उन्हें मुआवजा दे और बाद में उनके पिता मंजुनाथ से उसकी वसूली करे।

‘पे एंड रिकवर’ सिद्धांत लागू करने से इनकार

हाईकोर्ट ने MACT के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि दुर्घटना के समय मंजुनाथ के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था। कोर्ट ने कहा कि “पे एंड रिकवर” का सिद्धांत उन मामलों में लागू होता है, जहां दुर्घटना का शिकार कोई तीसरा पक्ष हो और बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन हुआ हो।

कोर्ट ने कहा, “वर्तमान मामले में दावा करने वालों के पिता और मृतका के पति पर लापरवाही और तेज गति से वाहन चलाने का आरोप है। मुआवजा देने की जिम्मेदारी प्रतिवादी संख्या 1 पर डाली गई है, जो मोटरसाइकिल का चालक और मालिक है। चूंकि प्रतिवादी संख्या 1 ही दावा करने वालों का पिता है, इसलिए ‘पे एंड रिकवर’ का आदेश लागू नहीं किया जा सकता।”

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पक्षों ने क्या दलीलें दीं

बच्चों की ओर से पेश अधिवक्ता सतीशा टी ने दलील दी कि मंजुनाथ के पास दुर्घटना के समय वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था, जिससे बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन हुआ। उन्होंने कहा कि अधिकरण को “पे एंड रिकवर” सिद्धांत लागू करना चाहिए था, जिसके तहत बीमा कंपनी पहले दावेदारों को मुआवजा देती है और बाद में पॉलिसी की शर्तों के जानबूझकर उल्लंघन की स्थिति में बीमाधारक से राशि वसूलती है।

वहीं, बीमा कंपनी की ओर से अधिवक्ता एच. सी. बेट्सूर ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह सिद्धांत इस मामले में लागू नहीं होता क्योंकि मोटरसाइकिल का मालिक और चालक स्वयं बच्चों का पिता तथा मृतका का पति था। उन्होंने कहा कि चूंकि दायित्व सीधे मालिक-चालक पर था, इसलिए अधिकरण ने बीमा कंपनी को पहले भुगतान करने का निर्देश न देकर सही निर्णय लिया।

मामले की पृष्ठभूमि

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यह मामला 28 सितंबर 2018 की सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। मंजुनाथ अपनी पत्नी मंजुला को मोटरसाइकिल पर पीछे बैठाकर जा रहे थे। आरोप है कि उनकी लापरवाही और तेज गति से वाहन चलाने के कारण मोटरसाइकिल दुर्घटनाग्रस्त हो गई, जिससे मंजुला की मृत्यु हो गई।

जांच के बाद पुलिस ने मंजुनाथ के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। आरोपपत्र में उन पर लापरवाही और तेज गति से वाहन चलाकर दुर्घटना करने, जिससे उनकी पत्नी की मौत हुई, तथा बिना वैध ड्राइविंग लाइसेंस के वाहन चलाने का आरोप लगाया गया। इन्हीं तथ्यों के आधार पर MACT ने दोनों बच्चों के पक्ष में 25 लाख रुपये का मुआवजा तय करते हुए पूरी जिम्मेदारी मंजुनाथ पर डाली थी और बीमा कंपनी को दायित्व से मुक्त कर दिया था। हाईकोर्ट ने अब उसी आदेश को बरकरार रखा है।

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