डिस्चार्ज के स्तर पर मिनी-ट्रायल की अनुमति नहीं: मद्रास हाईकोर्ट ने बीएसपी नेता के. आर्मस्ट्रांग हत्या मामले में आरोपी की याचिका खारिज की

मद्रास हाईकोर्ट ने बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के पूर्व तमिलनाडु प्रदेश अध्यक्ष के. आर्मस्ट्रांग की हत्या के मामले में एक आरोपी की डिस्चार्ज (दोषमुक्त करने) याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस शमीम अहमद की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 250 के तहत आरोपों के निर्धारण के चरण पर अदालतें मिनी-ट्रायल नहीं चला सकतीं और न ही साक्ष्यों का गहराई से मूल्यांकन कर सकती हैं। अदालत को केवल यह देखना होता है कि मुकदमे की कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त प्रथम दृष्टया साक्ष्य मौजूद हैं या नहीं।

मामले का पृष्ठभूमि

5 जुलाई 2024 को बीएसपी के तमिलनाडु प्रदेश अध्यक्ष के. आर्मस्ट्रांग की एक समूह द्वारा बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। के-1 सेम्बियम पुलिस स्टेशन द्वारा दर्ज मामला संख्या 293/2024 की जांच के दौरान पुलिस ने घटनास्थल के पास से दो देशी बम बरामद किए थे।

याचिकाकर्ता कुमारा उर्फ सेंथिलकुमार (आरोपी संख्या 28) पर आरोप है कि उसने 14 जून 2024 को अन्य सह-आरोपियों को ये देशी बम मुहैया कराए थे। उसे 22 अगस्त 2024 को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, हथियार अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 201 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया, जिसे चेन्नई के प्रधान सत्र न्यायालय ने संज्ञान में लिया।

याचिकाकर्ता ने सत्र अदालत के समक्ष डिस्चार्ज याचिका (आपराधिक विविध याचिका संख्या 12/2025) दायर की थी। इस याचिका के लंबित रहने के दौरान, हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ ने 24 सितंबर 2025 को चार्जशीट रद्द करते हुए जांच सीबीआई को सौंप दी थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने चार्जशीट रद्द करने के आदेश पर 10 अक्टूबर 2025 को रोक लगा दी और बाद में 19 नवंबर 2025 को सीबीआई को जांच स्थानांतरित करने पर भी रोक लगा दी, जिससे ट्रायल कोर्ट द्वारा लिया गया संज्ञान प्रभावी रहा। इसके बाद 28 अप्रैल 2026 को प्रधान सत्र न्यायाधीश, चेन्नई ने डिस्चार्ज याचिका खारिज कर दी, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता विक्रम वीरासामी ने तर्क दिया कि सत्र अदालत ने आरोपी की विशिष्ट भूमिका का स्वतंत्र विश्लेषण नहीं किया। उन्होंने निम्नलिखित बिंदु रखे:

  • किसी भी सीसीटीवी फुटेज में याचिकाकर्ता की घटनास्थल पर उपस्थिति या अपराध में संलिप्तता नजर नहीं आती।
  • याचिकाकर्ता के पास से कोई विस्फोटक सामग्री, हथियार या आपत्तिजनक वस्तु बरामद नहीं हुई है।
  • याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई विशिष्ट प्रत्यक्ष कार्य का उल्लेख नहीं है, और सह-आरोपियों के बयानों से भी यह साबित नहीं होता कि उसे ले जाए जा रहे सामान की प्रकृति या उसके आपराधिक उपयोग की जानकारी थी।
  • ठोस जोड़ने वाले साक्ष्यों के अभाव में याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानूनी रूप से पोषणीय नहीं है।
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राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए सरकारी वकील एम.एम.आई. खलील ने याचिका का विरोध किया और कहा:

  • सुप्रीम कोर्ट द्वारा चार्जशीट रद्द करने पर रोक लगाए जाने के कारण निचली अदालत द्वारा लिया गया संज्ञान पूरी तरह प्रभावी है।
  • याचिकाकर्ता के खिलाफ देशी बम आपूर्ति करने और आईपीसी की धारा 201 के तहत आरोप तय करने के पर्याप्त प्रथम दृष्टया साक्ष्य मौजूद हैं।
  • याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए आधार पूर्णतः तथ्यात्मक हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच केवल ट्रायल के दौरान ही संभव है।
  • डिस्चार्ज के स्तर पर राहत देने से साक्ष्यों से छेड़छाड़, मुकदमे में बाधा और आरोपी के फरार होने का जोखिम बढ़ जाएगा।

अदालत का विश्लेषण और कानूनी नजीरें

हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 173 / BNSS के तहत डिस्चार्ज के दायरे की समीक्षा करते हुए कहा कि अदालत को केवल अंतिम रिपोर्ट, प्रस्तुत दस्तावेजों, धारा 161 के तहत दर्ज बयानों और स्वीकारोक्ति बयानों पर विचार करना होता है।

जस्टिस शमीम अहमद ने रेखांकित किया कि डिस्चार्ज के स्तर पर अदालतें विस्तृत जांच या मिनी-ट्रायल नहीं कर सकतीं। अपने निष्कर्ष के समर्थन में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख फैसलों का हवाला दिया:

  1. तमिलनाडु राज्य बनाम एन. सुरेश राजन (2014): “यह सही है कि डिस्चार्ज आवेदनों पर विचार करते समय अदालत अभियोजन पक्ष के प्रवक्ता या पोस्ट ऑफिस के रूप में कार्य नहीं कर सकती और यह देखने के लिए साक्ष्यों की छंटाई कर सकती है कि आरोप पूरी तरह से निराधार तो नहीं हैं। हालांकि, इस चरण में अदालत को यह मानकर चलना होता है कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश सामग्री सच है और उसका मूल्यांकन केवल यह देखने के लिए किया जाता है कि क्या वे कथित अपराध के सभी आवश्यक तत्वों को प्रकट करती हैं। इस स्तर पर साक्ष्यों के संभावित मूल्य की गहराई में जाकर यह तय नहीं किया जा सकता कि सजा होगी या नहीं। अदालत को केवल यह देखना है कि अपराध के घटित होने का अनुमान लगाने का आधार मौजूद है या नहीं। कानून इस चरण पर मिनी-ट्रायल की अनुमति नहीं देता।”
  2. राज्य बनाम ए. अरुण कुमार (2015) (सज्जन कुमार बनाम सीबीआई, 2010 का संदर्भ लेते हुए): “शुरुआती चरण में यदि ऐसा गंभीर संदेह मौजूद है जो अदालत को यह मानने के लिए प्रेरित करता है कि आरोपी ने अपराध किया है, तो अदालत यह नहीं कह सकती कि कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं। प्रारंभिक चरण में आरोपी के दोषी होने का अनुमान केवल यह तय करने के लिए लगाया जाता है कि प्रथम दृष्टया मुकदमा चलाया जाना चाहिए या नहीं।”
  3. राज्य (निरीक्षक, चेन्नई) बनाम एस. सेल्वी एवं अन्य (2018): “सत्र मामलों में आरोप तय करते समय न्यायाधीश के पास यह देखने की सीमित शक्ति होती है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। जहां अदालत के समक्ष प्रस्तुत सामग्री आरोपी के खिलाफ गंभीर संदेह पैदा करती है, वहां आरोप तय करना पूरी तरह से उचित है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि न्यायाधीश मामले के गुण-दोष की विस्तृत जांच करे और साक्ष्यों को इस तरह तौले जैसे वह स्वयं ट्रायल चला रहा हो।”
  4. अमित कपूर बनाम रमेश चंदर एवं अन्य (2012): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि आरोप तय करना एक अंतरिम राय है, जो मुकदमे के अंतिम निष्कर्ष के अधीन होती है। जब तथ्यों की सत्यता का परीक्षण केवल पूर्ण ट्रायल के दौरान ही हो सकता है, तब हाईकोर्ट इस चरण पर साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता।
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अदालत का निर्णय

इन स्थापित सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि वर्तमान चरण दस्तावेजों और रिकॉर्ड का गहराई से मूल्यांकन करने के लिए उपयुक्त नहीं है। याचिकाकर्ता के तर्कों का निर्णय केवल साक्ष्य दर्ज करने के बाद पूर्ण ट्रायल के माध्यम से ही किया जा सकता है।

परिणामस्वरूप, आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई और जुड़ी हुई आपराधिक विविध याचिका बंद कर दी गई। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश में दी गई टिप्पणियां केवल पुनरीक्षण याचिका के निपटारे के लिए हैं और इनका मुख्य ट्रायल में आरोपी के बचाव पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

मामले का विवरण

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मामले का शीर्षक: कुमारा उर्फ सेंथिलकुमार बनाम राज्य, प्रतिनिधि – निरीक्षक, के-1 सेम्बियम पुलिस स्टेशन, चेन्नई
वाद संख्या: आपराधिक पुनरीक्षण याचिका संख्या 1428/2026 (आपराधिक विविध याचिका संख्या 12309/2026)
पीठ: जस्टिस शमीम अहमद
निर्णय की तिथि: 16-07-2026

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