कर्नाटक हाईकोर्ट ने अवैध सट्टेबाज़ी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में विधायक के.सी. वीरेन्द्र की गिरफ्तारी को सही ठहराया

प्रवर्तन निदेशालय (ED) की मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध सट्टेबाज़ी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई को मज़बूती देते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने चित्रदुर्ग ज़िले के कांग्रेस विधायक के.सी. वीरेन्द्र (पप्पी) की मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) के तहत की गई गिरफ्तारी को वैध ठहराया है।

न्यायालय ने विधायक की पत्नी आर.डी. चैत्रा द्वारा दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया जिसमें गिरफ्तारी को अवैध, मनमाना और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया था। यह आदेश 15 अक्टूबर को पारित किया गया। मामला वीरेन्द्र द्वारा कथित रूप से संचालित एक बड़े अवैध सट्टेबाज़ी और मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क से जुड़ा है।

ED ने जांच की शुरुआत कई एफआईआर में अवैध ऑनलाइन और ऑफलाइन सट्टेबाज़ी व जालसाज़ी के आरोपों के आधार पर की थी। जांच में King567 जैसे प्लेटफॉर्म की पहचान हुई, जिसे वीरेन्द्र और उनके सहयोगियों द्वारा चलाए जाने का आरोप है। इन प्लेटफॉर्म्स के ज़रिए करोड़ों रुपये की अवैध कमाई की गई, जिसे भारत, श्रीलंका, नेपाल और दुबई में स्थित शेल कंपनियों और कैसिनो के माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग किया गया।

ED की प्रारंभिक जांच में वीरेन्द्र को इस पूरे नेटवर्क का कथित सरगना बताया गया। उन्हें 23 अगस्त को सिक्किम के गंगटोक में गिरफ्तार किया गया और विशेष PMLA अदालत ने उन्हें 15 दिन की ED हिरासत में भेजा। वह फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं और जांच जारी है।

आर.डी. चैत्रा ने याचिका में तर्क दिया कि गिरफ्तारी धारा 19 PMLA का उल्लंघन है, क्योंकि वीरेन्द्र के खिलाफ ज़्यादातर FIR या तो बंद हो चुकी हैं या सुलझा ली गई हैं। केवल FIR संख्या 218/2022, जिसमें 30,000 रुपये का विवाद था, लंबित है। उन्होंने कहा कि यह मामला मूल रूप से सिविल विवाद है और इसमें वीरेन्द्र की सीधी भूमिका या FonePaisa Payment Solutions Pvt. Ltd. जैसे पेमेंट गेटवे से कोई सीधा संबंध नहीं दिखाया गया।

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वहीं, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने ED की ओर से दलील दी कि यह 30,000 रुपये वाला मामला तो “आइसबर्ग की नोक” भर है। एजेंसी ने पर्याप्त साक्ष्य पेश किए जिससे धारा 19 के तहत गिरफ्तारी के लिए “कारण विश्वास” बनता है। ASG ने कहा कि विदेशी कड़ियों और पैसों की ट्रेल का पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ ज़रूरी थी।

ED ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 2(1)(u) के अनुसार ‘अपराध की आय’ में न सिर्फ अनुसूचित अपराध से प्राप्त संपत्ति शामिल है बल्कि उससे संबंधित अन्य आपराधिक गतिविधियों से प्राप्त संपत्ति भी आती है। इस मामले में वास्तविक अपराध की आय FIR में बताई गई राशि से कहीं अधिक है।

हाईकोर्ट ने ED की कार्रवाई को बरकरार रखते हुए कहा कि PMLA के तहत प्राथमिकी अपराध (predicate offence) की शर्त पूरी होती है, क्योंकि जब तक समापन रिपोर्ट (closure report) को न्यायालय स्वीकार नहीं करता, जांच जारी रह सकती है।

न्यायालय ने ED के “reason to believe” और गिरफ्तारी के आधारों की जांच की और पाया कि वीरेन्द्र की अवैध सट्टेबाज़ी गतिविधियों, धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग में संलिप्तता के पर्याप्त साक्ष्य हैं। कोर्ट ने माना कि गिरफ्तारी विधिसम्मत थी और याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही, याचिकाकर्ता को ज़मानत याचिका दायर करने की स्वतंत्रता दी गई।

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ED अब तक लगभग ₹150 करोड़ की अवैध संपत्ति जब्त कर चुकी है। एजेंसी शेल कंपनियों और विदेशी संस्थाओं के उस जटिल नेटवर्क को ध्वस्त करने की दिशा में काम कर रही है जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर धन शोधन के लिए किया गया।

हाईकोर्ट का यह फैसला ED को साइबर फ्रॉड और अवैध सट्टेबाज़ी से जुड़े बड़े मामलों में कार्रवाई करने की शक्ति को मज़बूत करता है और ऐसे मामलों में PMLA की व्यापक व्याख्या को रेखांकित करता है। यह फैसला भविष्य के समान मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नज़ीर साबित हो सकता है।

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