पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बी.आर. गवई ने रविवार को न्यायिक नियुक्तियों के लिए मौजूदा कॉलेजियम प्रणाली का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि “कम से कम फिलहाल के लिए” यह व्यवस्था देश के लिए सबसे उपयुक्त है।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन-2026 में बोलते हुए, जिसका विषय “न्यायिक शासन की पुनर्कल्पना: लोकतांत्रिक न्याय के लिए संस्थानों को मजबूत करना” था, पूर्व शीर्ष न्यायाधीश ने भारतीय कानूनी परिदृश्य की कई चुनौतियों पर अपनी बात रखी। उन्होंने न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच घर्षण से लेकर ‘नेशनल लिटिगेशन पॉलिसी’ की तत्काल आवश्यकता तक, कई महत्वपूर्ण मुद्दों को छुआ।
जजों के चयन की प्रक्रिया पर चल रही लंबी बहस को संबोधित करते हुए जस्टिस गवई ने स्वीकार किया कि कोई भी सिस्टम पूरी तरह दोषमुक्त नहीं होता।
जस्टिस गवई ने कहा, “मैं यह नहीं कहूंगा कि कॉलेजियम प्रणाली पूरी तरह से फूलप्रूफ है। कोई भी सिस्टम बिल्कुल परफेक्ट नहीं हो सकता। हर सिस्टम के अपने फायदे और नुकसान होते हैं। लेकिन इतने सालों के काम के अनुभव के बाद मेरा मानना है कि कॉलेजियम सिस्टम फिलहाल हमारे देश के लिए सबसे बेहतर है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया मनमानी नहीं है। इसमें हाईकोर्ट के नेतृत्व की सिफारिशें, इंटेलिजेंस इनपुट और केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया जैसे कई चरण शामिल होते हैं, जिसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम अंतिम फैसला लेता है।
जस्टिस गवई ने हाईकोर्टों में जजों के स्वीकृत पदों और वास्तविक नियुक्तियों के बीच “भारी अंतर” पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने विशेष रूप से उन नामों का जिक्र किया जिन्हें कॉलेजियम द्वारा दोबारा भेजने (reiteration) के बावजूद सरकार ने मंजूरी नहीं दी है।
सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा फैसलों के अनुसार, यदि कॉलेजियम किसी नाम को दूसरी बार भेजता है, तो कार्यपालिका उस पर नियुक्ति करने के लिए बाध्य है।
जस्टिस गवई ने कहा, “मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि कई ऐसे नाम हैं जिन्हें दूसरी बार सिफारिश किए जाने के बाद भी सरकार ने अभी तक मंजूरी नहीं दी है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि वह किसी पर “दोषारोपण” नहीं कर रहे हैं, बल्कि इस गंभीर मुद्दे को सामने रख रहे हैं। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वह विचार करे कि क्या वे इन नियुक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को मानने के लिए बाध्य हैं।
मौलिक अधिकारों पर खतरे के समय न्यायिक हस्तक्षेप का कड़ा बचाव करते हुए पूर्व CJI ने कार्यपालिका की सख्त कार्रवाइयों पर सवाल उठाए।
उन्होंने पूछा, “जब कार्यपालिका अपनी पूरी ताकत के साथ किसी व्यक्ति के अपराधी होने के संदेह मात्र पर उसके घर पर बुलडोजर चला देती है, तो क्या न्यायपालिका से यह उम्मीद की जाती है कि वह चुपचाप बैठी रहे? ऐसी कार्रवाई कानून के शासन पर प्रहार करती है।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि अदालतें आमतौर पर संयम बरतती हैं, लेकिन जब कार्यपालिका, न्यायपालिका और संसद के बीच शक्तियों का संतुलन बिगड़ने लगता है, तो हस्तक्षेप करना अनिवार्य हो जाता है।
जस्टिस गवई ने अदालतों में बढ़ते मुकदमों के लिए राज्य की भूमिका पर भी बात की। उन्होंने नोट किया कि सरकार अक्सर उन मामलों में भी जमानत आदेशों को चुनौती देती है जहां व्यक्ति अपनी सजा का 70 प्रतिशत हिस्सा काट चुका होता है।
इस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने नेशनल लिटिगेशन पॉलिसी को तत्काल लागू करने की मांग की। उन्होंने कहा, “सालों से इस पॉलिसी पर चर्चा हो रही है, लेकिन यह अभी तक धरातल पर नहीं आई है। यदि कार्यपालिका इसे लागू करती है, तो इससे अदालतों में लंबित मामलों को कम करने में बड़ी मदद मिलेगी।”
न्यायपालिका को विकास के रास्ते में “रोड़ा” बताने वाली आलोचनाओं का जवाब देते हुए जस्टिस गवई ने कहा कि अदालतें केवल सतत विकास (Sustainable Development) सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करती हैं। उन्होंने कहा कि अदालती फैसलों के कारण ही आज देश में जंगल सुरक्षित हैं और प्रदूषण के मुद्दों पर ध्यान दिया जा रहा है।
उन्होंने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि ‘विकसित भारत’ का संकल्प तभी पूरा होगा जब विकास के साथ-साथ ‘कानून के शासन’ (Rule of Law) का भी पूरा सम्मान किया जाए।

