आतंकवाद से जुड़े मामलों में शीघ्र न्याय के लिए विशेष अदालतों की जरूरत: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से दिल्ली में कोर्ट स्थापित करने पर मांगी रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि देश में अतिरिक्त ट्रायल कोर्ट्स की स्थापना से आपराधिक न्याय प्रणाली और अधिक “मजबूत” होगी, जिससे आरोपियों को ज़मानत या शीघ्र सुनवाई जैसे राहतों के लिए शीर्ष अदालत का रुख करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी एक आतंकी मामले में सुनवाई के दौरान की। यह मामला वर्ष 2021 में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है, जिसकी जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) कर रही है और जिसमें आईएसआईएस से कथित संबंधों का आरोप है।

“कोर्ट्स की संख्या बढ़ने से मज़बूत होगी न्याय व्यवस्था”: CJI

पीठ ने कहा, “मकसद यह है कि ऐसी कोई स्थिति न आए कि लोगों को कोर्ट आना पड़े। और यह तब ही संभव है जब अतिरिक्त अदालतें स्थापित की जाएं।”

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पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से कहा कि केंद्र सरकार दिल्ली में विशेष अदालत स्थापित करने की प्रक्रिया पर 10 फरवरी तक स्थिति स्पष्ट करे। कोर्ट ने इससे पहले 6 जनवरी को केंद्र और दिल्ली सरकार से इस मामले की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालत गठित करने पर विचार करने को कहा था।

आईएसआईएस से जुड़े कथित आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई

यह मामला मोहम्मद हेदायतुल्लाह नामक आरोपी से जुड़ा है, जिस पर टेलीग्राम ग्रुप्स के जरिए आईएसआईएस की विचारधारा फैलाने और लोगों को कट्टरपंथी बनाने का आरोप है। आरोपी को 22 अक्टूबर 2022 को NIA ने गिरफ्तार किया था।

आरोपों के अनुसार, उसने सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार के खिलाफ नफरत फैलाने और समुदायों में दुश्मनी बढ़ाने का प्रयास किया। साथ ही, आईएसआईएस के लिए पैसे ट्रांसफर करने, बारूद बनाने के तरीकों संबंधी दस्तावेज और “बयात” (आतंकी संगठन के प्रति निष्ठा की शपथ) जैसे आपत्तिजनक सामग्री भी उससे बरामद की गई।

हाईकोर्ट ने कहा— “सक्रिय समर्थक था, जमानत नहीं दी जा सकती”

दिल्ली हाईकोर्ट ने उसकी जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा था कि आरोपी कोई “निष्क्रिय समर्थक” नहीं बल्कि आईएसआईएस का सक्रिय समर्थक था। अदालत ने कहा था कि वह जानबूझकर खलीफा शासन के लिए हिंसात्मक जिहाद का समर्थन कर रहा था।

“अपीलकर्ता ने 2018 में अबू बकर अल बगदादी और अबू अल-हसन अल-हाशिमी अल-कुरैशी के नाम पर ‘बयात’ ली थी। वह एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति है और आईएसआईएस की गतिविधियों के बारे में भली-भांति जानता था,” हाईकोर्ट ने कहा था।

सुप्रीम कोर्ट: मुकदमे में देरी ज़मानत की वैध आधार बनती है

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि यदि मुकदमा लंबा खिंचता है तो आरोपी द्वारा यह तर्क देना कि उसे बिना मुकदमे के लंबी हिरासत में नहीं रखा जा सकता— यह तर्क वैध बन जाता है।

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NIA ने अदालत को बताया कि इस मामले में कुल 125 गवाहों की जांच की जानी है, जिससे यह ज़रूरी हो जाता है कि एक विशेष अदालत गठित कर मुकदमे की रोज़ाना सुनवाई सुनिश्चित की जाए।

अब इस मामले की अगली सुनवाई 10 फरवरी को होगी। तब तक केंद्र सरकार को विशेष अदालत स्थापित करने की दिशा में उठाए गए कदमों की जानकारी सुप्रीम कोर्ट को देनी होगी।

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