न्यायिक आदेश पारित करने के लिए जज पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता


हाल ही में गौहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश माननीय न्यायमूर्ति अजय लांबा ने न्यायिक अधिकारी को विपाक्षी के रूप में नियुक्त करके अधीनस्थ न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर निर्णय दिया है।

राजेंद्र बागलरी बनाम द डिविजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के मामले के संक्षिप्त तथ्य इस प्रकार हैं –

गुवाहाटी उच्च न्यायालय के समक्ष एक रिट याचिका दायर की गई, जिसमें निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी गयी और यह प्रार्थना की गई थी कि ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश को रद्द कर दिया जाए। ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी किया था और एक गाय के शव का अपवहन करने का कारण पूंछा था।


माननीय मुख्य न्यायाधीश ने याचिका में कहा कि ट्रायल कोर्ट के जज सब-डिवीजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, बिश्वनाथ चारीली, जिन्होंने विचाराधीन आदेश पारित किया था, को पार्टी के रूप में प्रतिवादी बनाया नहीं जा सकता। उनके अलावा, गुवाहाटी उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल, न्यायमूर्ति अमरेन्द्र हजारिका उप-विभागीय न्यायिक मजिस्ट्रेट चाराली और यहां तक कि गुवाहाटी उच्च न्यायालय को भी प्रतिवादी के रूप में याचिका में जोड़ा गया था।

उच्च न्यायालय का तर्क

मामले को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने एक बहुत कड़ा रुख अपनाया और कहा कि जिस न्यायाधीश ने विवादित आदेश पारित किया था, उसे उसके नाम और पदनाम से प्रतिवादी बनाया गया था। उच्च न्यायालय ने कहा कि एक न्यायाधीश को उसके द्वारा पारित न्यायिक आदेश के लिए सीधे मुकदमे मे प्रतिवादी नहीं बनाया जा सकता है।

उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि यदि प्रतिवादी अदालत के आदेश से क्षुब्ध था, तो वो आदेश के खिलाफ अपील या रिट याचिका दायर कर सकता था, लेकिन न्यायाधीश को उनके नाम से प्रतिवादी बनाने और उनके खिलाफ मुकदमा करने की अनुमति कानून में नहीं है।

गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने अनवार हुसैन बनाम अजोय कुमार मुखर्जी और अन्य, एआईआर 1965 एससी 1651 में सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का हवाला दिया, जहां यह कहा गया था कि न्यायिक कार्य करने वाले किसी भी न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट, कलेक्टर या किसी अन्य व्यक्ति पर उस न्यायिक कार्य से सबंधित कोई मुकदमा दायर नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट द्वारा सावित्री देवी बनाम जिला जज, गोरखपुर का भी सन्दर्भ दिया गया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक न्यायिक अधिकारी को पार्टी के रूप में जोड़ा नहीं जा सकता क्योंकि न्याययिक अधिकारी को अन्य सरकारी अधिकारियों के बराबर नहीं माना जा सकता है।

न्यायालय ने न्यायाधीशों (संरक्षण) अधिनियम, 1985 की धारा 3 का भी उल्लेख किया, जो न्यायाधीशों को उनके आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में कार्यों के लिए सुरक्षा प्रदान करता है।
मुख्य न्यायाधीश के अनुसार, न्यायिक अधिकारी आदेश पारित करते समय अपना कर्तव्य निभा रहो है, और यदि आदेश अवैध था, तो आदेश को चुनौती देने के लिए उपयुक्त उपाय किये जाने चाहिए थे।

कोर्ट का फैसला

उपरोक्त के आलोक में हाईकोट द्वारा याचिका को खारिज कर दिया गया और याचिकाकर्ता पर 10000 रूपये का जुर्माना लगाया गया, जोकि उसके वेतन से प्राप्त किया जायेगा।

हालाँकि, न्यायालय ने यह भी कहा कि उचित याची सक्षम न्यायालय के समक्ष आदेशों को चुनौती देने के लिए स्वतंत्रता है। याचिकाकर्ता को कानूनी रूप से कानूनी उपायों का लाभ उठाने की अनुमति दी गई है।

Case Details-

Case Title: RAHENDRA BAGLARI Vs. The Guwahati High Court & Ors.

Case No.: Case No.: WP(C) 3057/2020

Date of Order: 15.09.2020

Quorum: Chief Justice Mr Ajai Lamba

Appearance: Mr D Saikia, Senior Advocate for the petitioner; Mr PP Dutta for respondents no.1-3 and Mr P Sengupta for respondent no.4

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