पीड़िता के अन्तर्विरोधी बयान तथा धारा 376 की FIR में देरी पर दोषी दोषमुक्तः इलाहाबद हाईकोर्ट

आज का नवीनतम उच्च न्यायालय का निर्णय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ का है, जिसमें श्री गुरप्रीत और बलविंदर, जो धारा 376 (2) आईपीसी के तहत दोषी ठहराया गये थे और उम्रकैद की सजा काट रहे थे, की अपील को इलाहाबद उच्च न्यायालय द्वारा स्वीकार कर लिया गया है।


गुरप्रीत उर्फ सोदी बनाम यू.पी. और बलबिंद्र उर्फ बग्गा बनाम यू.पी. मामले के संक्षिप्त तथ्य इस प्रकार है-

इस मामले में अपीलकर्ताओं पर बलात्कार करने का आरोप लगाया गया था। पीड़िता के अनुसार, वह 07.06.2009 को सुबह 8 बजे के आसपास खेत में गई थी, जहॉ उसका अपहरण गुरप्रीत उर्फ सोदी और दो अन्य लोगों द्वारा किया गया था और उसे एक खेत में ले जाया गया था जहाँ उसके साथ सभी आरोपियों ने बलात्कार किया था।

पीड़िता ने कहा कि आरोपी उसके साथ बलात्कार करने के बाद भाग गया, और अगली सुबह उसे होश आया। वह हुसैनपुर गाँव तक पहुँचने में सक्षम थी और उसने अपने पिता से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन असफल रही। इसके बाद, उसने संजय सिंह नामक व्यक्ति से संपर्क किया, जिसने आरोपी के पिता से संपर्क किया, जो उसे वहॉ से ले गये।


पीड़िता के बयान के अनुसार, आरोपी गुरप्रीत ने उसे 08.06.2020 को फोन किया और पुलिस से संपर्क करने पर उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी। हालांकि, पीड़िता ने साहस जुटाया और 11.06.2020 को पुलिस से संपर्क किया और उसी दिन और आरोपी गुरप्रीत और दो अन्य पर मुकदमा दर्ज कराया।

ट्रायल कोर्ट के समक्ष कार्यवाही

जब न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने उसका बयान दर्ज किया गया, तो उसने इस मामले में दूसरे अपीलकर्ता का नाम, श्री गुरप्रीत, अज्ञात लोगों में से एक के रूप में लिया जिसने उसका बलात्कार किया था। इस मामले में की दोनो आरोपियों के खिलाफ धारा 376 (2) जी और 506 (2) आई.पी.सी. के तहत मुकदमा चलाया गया था।

मुकदमे के दौरान, अदालत द्वारा कई गवाहों की सुनवाई की गई और बाद में, अभियुक्त (इस में अपीलकर्ता) को दोषी ठहराया गया और सजा सुनाई गई।

ट्रायल कोर्ट के आदेश से क्षुब्ध होकर, आरोपी ने यह अपील इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष दायर की।

उच्च न्यायालय के समक्ष अपीलकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत किये गये तर्क

वरिष्ठ अधिवक्ता, धर्मेन्द्र सिंघल ने न्यायालय के समक्ष सात मुख्य विषय उठाए –

  • एफआईआर दाखिल करने में पाँच दिन की देरी थी। जिसे संतोषजनक ढंग से समझाया नहीं गया है।
  • उन्होंने कहा कि पीड़ित के पिता आरोपी पर अपनी जमीन बेचने का दबाव बना रहे थे; इसीलिए उसे झूठा फंसाया गया। सह आरोपी का नाम लिया गया क्योंकि वह आरोपी नंबर 1 का समर्थन कर रहा था
  • विक्टिम ने एफआईआर दर्ज करने के नौ दिन बाद आरोपी की पहचान की, हालांकि वह उसे पहले से जानती थी। पीड़ित के बयान में जिस स्थान पर अपराध किया गया था, उसे भी बदल दिया गया था।
  • यहां तक कि बलात्कार की घटना के संबंध में चिकित्सा परीक्षा से भी साबित नहीं किया जा सका।
  • पीड़िता ने दावा किया कि उसने हुसैनपुर गांव से फोन किया, जो उस स्थान से 8 किमी दूर था जहां कथित अपराध हुआ था। हालाँकि, बीच में छह गाँव थे, और वह इनमें से किसी से भी मदद माँग सकती थी।
  • ट्रायल कोर्ट को केवल पीड़िता के बयान के आधार पर अभियुक्त को दोषी नहीं मानना चाहिए था।
  • वकील ने संतोष प्रसाद / संतोष कुमार बनाम बिहार राज्य में सर्वोच न्यायालय के निर्णय का उल्लेख किया जहां यह कहा गया है कि ऐसे मामले में जहां अभियोजन पक्ष के सबूत विश्वास को प्रेरित नहीं करते हैं और अविश्वास और दोषपूर्ण प्रतीत होता है और स्टर्लिंग गुणवत्ता का नहीं है, यह केवल अभियोजन पक्ष के एकान्त साक्ष्य पर आरोपियों को दोषी ठहराना सुरक्षित नहीं होगा।

राज्य द्वारा उठाए गए तर्क (उत्तरदाता)

  • काउंसिल ने कहा कि एफ.आई.आर. दाखिल करने में देरी इस लिए हुई क्यूँकि आरोपी नंबर 1 गुरप्रीत ने पीड़ित को धमकी दी थी।
  • उन्होंने यह भी कहा कि जैसे ही पीड़िता को हुसैनपुर गाँव के पास होश आया, उसने वहाँ से फोन किया।
  • उन्होंने डॉ केशव स्वामी की गवाही का भी उल्लेख किया जहां उन्होंने कहा कि बलात्कार के कारण पीड़ित के शरीर पर चोट लगी थी।
  • वकील के अनुसार, बचाव पक्ष अपने मामले को साबित करने में असमर्थ था, और ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीश ने उन्हें दोषी ठहराया था।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का तर्क

माननीय न्यायाधीशों ने कहा कि कि अधिकांश ग्रामीणों को पहले से ही अपराध के बारे में पता था, पीड़ित को अभियुक्तों द्वारा धमकाया नहीं जा सकता था और प्राथमिकी दर्ज करने में देरी नहीं होनी चाहिए थी। न्यायालय के अनुसार, पीड़िता द्वारा आरोपियों के खिलाफ कहानी गढ़ने में देरी का इस्तेमाल किया जा सकता है।

यह भी कहा गया किया गया कि बालबिंदर, अपीलकर्ता नंबर 2 को केवल 19 दिनों के बाद फंसाया गया था और यह स्थापित किया गया था कि पीड़ित को कथित अपराध की घटना से पहले ही आरोपी का पता चल गया था, इसलिए उसे पहले से पहचानना चाहिए था और यह दर्शाता है कि वह हो सकता है झूठा फंसाया गया हो।

इस मुद्दे पर अगर पीड़िता एक स्टर्लिंग गवाह थी, तो अदालत ने इस तथ्य को नोट किया कि मुख्य गवाही के दौरान दिया गया उसका बयान अलग था, और जब उससे जिरह की गयी तो उसकी कहानी बदल गई।
न्यायालय ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि चिकित्सा रिपोर्ट अनिर्णायक थी।

कोर्ट का फैसला

सभी तथ्यों और साक्ष्यों के विशलेषण के बाद, न्यायालय न पाया कि उक्त मामले में अभियोजन पक्ष धारा 376(2) आईपीसी का मुकदमा संदेह से परे साबित करने में विफल रहा तथा अभियोजन द्वारा अपीलार्थीयों के कथन, जिसके लिए गवाह भी आये थे, को नकारा नहीं गया है और न ही ट्रायल कोर्ट ने इसका ठीक से विश्लेषण किया है। अतः यह भी इन अपीलों को अनुमति देने का एक कारण है।

अतः उक्त के आधार पर उच्च न्यायालय द्वारा ट्रायल कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए, दोनो अपीलार्थियों को दोषमुक्त करार दिया गया।

Case Details-

Case Title: Gurpreet alias Sodi vs State of U.P. and Balbindra alias Bagga vs the State of U.P.

Case No.: CRIMINAL APPEAL No. – 6966 of 2010 and  CRIMINAL APPEAL No. – 7153 of 2010

Date of Order: 23.09.2020

Quorum: Hon’ble Mr. Justice Ramesh Sinha & Hon’ble Mr. Justice Saurabh Shyam Shamshery
Appearance: Counsel of Appelant No.1  Devendra Saini, Dharmendra Singhal, Gaurav Kakkar, Govind Saran Hajela, Nafees Ahmad, Noor Mohammad, Rajeev Pandey, Vinay Kumar Sharma ; Counsel for Appellant No.2 :- Jitendra Kumar Shishodiya,Anurag Pathak,Govind Saran Hajela,Kameshwar Singh ; Counsel for Respondent :- Govt.Advocate, P.S.Pundir

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