सोशल मीडिया पर न्यायपालिका के खिलाफ बयानबाजी मामला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वीकार की बिना शर्त माफी, अवमानना केस बंद

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने फेसबुक लाइव वीडियो के जरिए न्यायपालिका पर अनुचित टिप्पणियां करने के मामले में एक वकील और पूर्व सांसद की बिना शर्त माफी स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ जारी आपराधिक अवमानना की कार्रवाई बंद कर दी है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस संदीप शर्मा की पीठ ने कड़ा संदेश दिया कि न्यायिक धैर्य को कभी भी अदालत की कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए।

न्यायिक धैर्य को कमजोरी न समझें: हाईकोर्ट

27 जुलाई को हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि अदालत अवमानना की शक्तियों का प्रयोग बेहद संयम के साथ करती है, लेकिन यह अधिकार न्यायिक अखंडता और गरिमा बनाए रखने के लिए एक आवश्यक साधन है। पीठ ने कहा कि अदालत द्वारा दिखाई गई उदारता कोई छूट या रियायत नहीं है, बल्कि यह कानून से जुड़े व्यक्तियों के सुधरने की क्षमता में अदालत के अटूट विश्वास का प्रमाण है।

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अदालत ने दोनों पक्षकारों को सख्त हिदायत दी कि भविष्य में सोशल मीडिया पर न्यायपालिका की छवि को धूमिल करने या उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाले किसी भी कृत्य पर त्वरित और कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

डकैती की जांच में देरी से उपजी नाराजगी का दिया हवाला

यह अवमानना मामला वर्ष 2025 में फेसबुक पर प्रसारित एक लाइव वीडियो से संबंधित है, जिसे अधिवक्ता धैर्य सुशांत द्वारा अपलोड किया गया था। इस वीडियो में हाईकोर्ट के एक जज पर गंभीर आरोप लगाए गए थे, साथ ही वकीलों, न्यायिक अधिकारियों और ड्रग डीलरों के बीच सांठगांठ की बात कही गई थी। हाईकोर्ट ने वीडियो का संज्ञान लेते हुए 3 मार्च 2025 को अवमानना कानून के तहत कारण बताओ नोटिस जारी कर अवमानना कार्रवाई शुरू की थी।

प्रसारण के कारणों को स्पष्ट करते हुए पक्षकारों ने अदालत को बताया कि उनके निवास स्थान पर लगभग 11 लाख रुपये मूल्य के सामान की सशस्त्र डकैती हुई थी। पुलिस जांच में हो रही देरी से उपजी निराशा और भावनात्मक तनाव के कारण उन्होंने यह वीडियो बनाया था, जिसके लिए उन्हें गहरा पछतावा है।

पहली माफी खारिज होने के बाद दाखिल किया नया हलफनामा

मामले की सुनवाई के दौरान 25 जून 2025 को पक्षकारों ने पहली बार माफीनामा प्रस्तुत किया था। हालांकि, पीठ ने उसे यह मानते हुए खारिज कर दिया था कि वह अपनी गलती को स्वीकार करने के बजाय सजा से बचने का एक औपचारिक प्रयास मात्र था। इसके बाद अदालत ने मामले को आरोपियों के खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप (चार्ज) तय करने के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया था।

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आरोप तय होने की प्रक्रिया से पूर्व 29 अप्रैल 2026 को दोनों पक्षकारों ने शपथ पत्र के साथ एक नई बिना शर्त माफी याचिका प्रस्तुत की। उन्होंने अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्वीकार किया कि उनके वक्तव्य अनुचित, अत्यधिक और न्यायपालिका के प्राधिकार को कम करने वाले थे।

हाईकोर्ट ने नोट किया कि दोनों पक्षकारों का पूर्व में ऐसा कोई अनुचित आचरण नहीं रहा है और उन्होंने बिना किसी हेरफेर या बचाव के अपनी गलती स्वीकार की है। माफीनामे को सच्चा और गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने अवमानना की कार्रवाई को समाप्त कर दिया और दोनों को भविष्य में न्यायिक संस्थाओं के प्रति उचित सम्मान बनाए रखने की चेतावनी दी।

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