पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाबी संगीत निर्माता पिंकी धालीवाल की रिहाई का आदेश दिया, गिरफ्तारी को अवैध बताया

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मंगलवार को पंजाबी संगीत निर्माता पुष्पिंदर पाल सिंह धालीवाल, जिन्हें पिंकी धालीवाल के नाम से जाना जाता है, की तत्काल रिहाई का आदेश दिया, तथा उनकी हालिया गिरफ्तारी को अवैध घोषित किया। मैड4म्यूजिक और अमर ऑडियो जैसे संगीत लेबल के साथ अपने काम के लिए जाने जाने वाले धालीवाल को गायिका एवं अभिनेत्री सुनंदा शर्मा को धोखा देने और आर्थिक शोषण करने के आरोप में मोहाली में मटौर पुलिस ने हिरासत में लिया था।

इस मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति एचएस बरार ने निर्देश दिया कि धालीवाल को तब तक रिहा किया जाए, जब तक कि उनकी गिरफ्तारी में प्रक्रियागत विसंगतियों का हवाला देते हुए उन्हें किसी अन्य मामले में पेश होने की आवश्यकता न हो। निर्णय के विस्तृत कारण बाद में एक व्यापक आदेश में दिए जाएंगे।

पंजाबी मनोरंजन उद्योग की एक प्रमुख हस्ती सुनंदा शर्मा ने धालीवाल पर गंभीर वित्तीय कदाचार का आरोप लगाया था। उन्होंने दावा किया कि 250 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई करने के बावजूद, धालीवाल ने अवैध रूप से उनकी सारी आय पर नियंत्रण कर लिया, जिससे उन्हें सीधे भुगतान नहीं मिल पाया। उन्होंने दावा किया कि इससे उनकी वित्तीय स्थिति काफी खराब हो गई और उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।

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धालीवाल की गिरफ्तारी ने विवाद को जन्म दिया, खास तौर पर इसे अंजाम देने के तरीके को लेकर। धालीवाल की कानूनी टीम के अनुसार, जिसमें वरिष्ठ अधिवक्ता आरएस राय, विनोद घई और अमित झांजी शामिल थे, उस समय उनके खिलाफ कोई औपचारिक एफआईआर या शिकायत दर्ज किए बिना ही उन्हें उनके घर से ले जाया गया। पुलिस लॉग में गिरफ्तारी शाम 7:38 बजे दर्ज की गई, लेकिन जब उनके वकील एक घंटे से भी कम समय बाद पुलिस स्टेशन पहुंचे, तो उन्हें किसी भी औपचारिक आरोप के अभाव के बारे में बताया गया।

धालीवाल के वकीलों द्वारा तुरंत एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई, जिसके कारण उसी दिन रात 11 बजे हाईकोर्ट द्वारा एक वारंट अधिकारी की नियुक्ति की गई। इसके बावजूद, पुलिस ने कथित तौर पर वारंट अधिकारी के साथ सहयोग करने में विफल रही, जब वह स्टेशन पर पहुंचे, तो एफआईआर या गिरफ्तारी ज्ञापन की एक प्रति देने से इनकार कर दिया, जो कथित तौर पर धालीवाल की प्रारंभिक हिरासत के सात घंटे बाद तैयार किया गया था।

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अदालत को बताया गया कि वारंट अधिकारी की नियुक्ति के बाद ही एफआईआर दर्ज की गई, जिससे गिरफ्तारी प्रक्रिया की वैधता और भी जटिल हो गई। गिरफ्तारी के लिए आधार प्रदान करने की कानूनी आवश्यकता पूरी नहीं की गई, जिसके कारण हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी को अवैध करार दिया।

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