गौहाटी हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म मामले में 20 साल की सजा रखी बरकरार, बैन के बावजूद ‘टू-फिंगर टेस्ट’ पर जताई हैरानी

गौहाटी हाईकोर्ट ने अपनी 13 वर्षीय गोद ली हुई बेटी के साथ बार-बार दुष्कर्म करने के आरोपी व्यक्ति की 20 साल की जेल की सजा को बरकरार रखा है। इसके साथ ही, अदालत ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिबंधित किए जाने के बावजूद पीड़िता का ‘टू-फिंगर टेस्ट’ किए जाने पर गहरा आश्चर्य और चिंता जताई है। पीठ ने कहा कि यह अवैज्ञानिक जांच प्रक्रिया पीड़िता की गरिमा, निजता और शारीरिक व मानसिक अखंडता के अधिकार का गंभीर हनन है।

टू-फिंगर टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला

जस्टिस माइकल जोथानखुमा और जस्टिस राजेश मजूमदार की पीठ ने 23 जुलाई को दिए अपने फैसले में निचली अदालत के 17 जुलाई 2023 के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें आरोपी को पोक्सो (POCSO) कानून की धारा 6 के तहत 20 वर्ष के सश्रम कारावास और 10,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर हैरानी व्यक्त की कि मामले की जांच करने वाले डॉक्टर ने पीड़िता की जांच में अब अमान्य हो चुके ‘टू-फिंगर टेस्ट’ का इस्तेमाल किया। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों—’लिल्लू बनाम हरियाणा राज्य (2013)’ और ‘झारखंड राज्य बनाम सैनेन्द्र कुमार राय (2022)’—का संदर्भ देते हुए कहा कि शीर्ष अदालत इस प्रथा पर पूरी तरह से रोक लगा चुकी है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि हाइमन का फटना या सही-सलामत होना यौन हिंसा का निर्णायक सबूत नहीं हो सकता, क्योंकि यह किसी अन्य गैर-यौन गतिविधियों से भी प्रभावित हो सकता है। अदालत ने दोहराया कि यह परीक्षण अवैज्ञानिक है और पीड़ित को दोबारा मानसिक आघात पहुंचाता है। मेडिकल पेशेवरों द्वारा यह परीक्षण करना पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) माना जाता है। अदालत ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के 2014 के उन दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया, जो इस प्रकार की जांच को प्रतिबंधित करते हैं, हालांकि वे कानूनी रूप से बाध्यकारी होने के बजाय परामर्शकारी हैं।

READ ALSO  केवल इसलिए पिता का बच्चों से मिलने का अधिकार नहीं छीना जा सकता क्योंकि उसने तलाक के बाद दोबारा शादी की है और उससे बच्चे है: कर्नाटक हाईकोर्ट

मामले का विवरण और प्राथमिकी दर्ज करने में देरी

यह मामला अप्रैल 2022 का है, जब पीड़िता की पालक मां काम पर बाहर गई हुई थी और आरोपी ने बच्ची के साथ बार-बार यौन उत्पीड़न किया। विरोध करने पर आरोपी पीड़िता को डंडे से पीटता था और जान से मारने की धमकी देता था। शुरुआत में पीड़िता ने अपनी पालक मां को इस बारे में बताया, लेकिन उसने मामला शांत रखने की सलाह दी। लगातार हो रहे उत्पीड़न से परेशान होकर बच्ची ने आखिरकार सितंबर 2022 में अपने एक पड़ोसी को आपबीती सुनाई, जिसके बाद ग्रामीणों की पहल पर पुलिस में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई गई।

अपीलकर्ता ने तर्क दिया था कि प्राथमिकी दर्ज कराने में कई महीनों की देरी हुई, जिससे आरोप संदिग्ध प्रतीत होते हैं। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि जब आरोपी परिवार का ही कोई सदस्य या अभिभावक होता है, तो ऐसे मामलों में पुलिस तक पहुंचने में देरी होना स्वाभाविक है और यह अदालती नज़ीरों के अनुकूल है।

बचाव पक्ष के दावों को बताया मनगढ़ंत

READ ALSO  मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय पर टिप्पणी मामला: डीएमके विधायक मारकंडन की याचिका पर मद्रास हाईकोर्ट में सुनवाई 27 जुलाई तक टली

आरोपी ने खुद को निर्दोष बताते हुए दावा किया था कि स्कूल न जाने और मोबाइल फोन पर बात करने को लेकर डांटने के कारण उसे झूठे मामले में फंसाया गया है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इसे बाद में गढ़ा गया बहाना माना, क्योंकि जिरह के दौरान पीड़िता से मोबाइल फोन से जुड़ा कोई सवाल नहीं पूछा गया था और न ही इस दावे के समर्थन में कोई सबूत पेश किया गया था।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि जांच अधिकारी ने आरोप पत्र में पीड़िता को गवाह के रूप में शामिल न करके गंभीर चूक की थी। हालांकि, ट्रायल कोर्ट के जज ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए पीड़िता को अदालत के गवाह के रूप में समन किया और उसका बयान आधिकारिक रिकॉर्ड पर लिया।

READ ALSO  आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, अस्पताल-स्कूलों से हटाने और वापस उसी इलाके में न छोड़ने का आदेश

हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज पीड़िता के बयान और ग्रामीणों के सामने आरोपी द्वारा किए गए इकबालिया बयान को पूरी तरह विश्वसनीय माना। सभी साक्ष्यों को सही पाते हुए पीठ ने दोषी की अपील खारिज कर दी और मामले में अदालत की सहायता करने वाले अमरीकस क्यूरी (Amicus Curiae) को नियमानुसार फीस भुगतान करने का निर्देश दिया।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles