सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट-यूजी) को पेन-पेपर मोड से ऑनलाइन माध्यम में स्थानांतरित करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित नंदन नीलेकणी समिति की सिफारिशों की समीक्षा करने पर सहमति जताई है। मामले की अगली सुनवाई अगले सोमवार को निर्धारित की गई है।
साइबर और डेटा सुरक्षा के लिए कड़े मानकों की आवश्यकता
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि परीक्षा प्रणाली को डिजिटल रूप में बदलते समय लीक से हटकर नए सुझावों की जरूरत है। शीर्ष अदालत ने रेखांकित किया कि ऑनलाइन परीक्षा आयोजित करने के लिए मजबूत साइबर सुरक्षा और डेटाबेस सुरक्षा से जुड़े अतिरिक्त सुरक्षा उपाय बेहद आवश्यक हैं।
उच्चस्तरीय समिति का गठन और उसकी संरचना
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार इस मुद्दे को लेकर अत्यंत गंभीर है। उन्होंने जानकारी दी कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस उच्चस्तरीय समिति के गठन की घोषणा की थी।
तकनीक विशेषज्ञ नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता वाले इस कार्यबल में कई प्रमुख हस्तियों को शामिल किया गया है। इनमें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व प्रमुख एस. सोमनाथ, इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के पूर्व निदेशक तपन डेका, आईआईटी मद्रास के निदेशक वी. कामाकोटी, पूर्व शिक्षा सचिव अनिता करवाल और लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ अमृत लाल मीणा सदस्य के रूप में शामिल हैं।
मामले की पृष्ठभूमि और सीबीआई जांच
यह कानूनी कार्यवाही 3 मई को आयोजित नीट-यूजी परीक्षा रद्द होने के बाद शुरू हुई थी। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) ने पेपर लीक के आरोपों के बीच 12 मई को इस परीक्षा को रद्द कर दिया था। वर्तमान में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) इन आरोपों की जांच कर रहा है। इसके पश्चात 21 जून को पुनः परीक्षा आयोजित की गई थी।
आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह ने अपनी याचिका में 21 जून की पुनः परीक्षा को कंप्यूटर आधारित टेस्ट (सीबीटी) मोड में कराने का अनुरोध किया था। इससे पहले 1 जून को सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया था।

