डी.के. शिवकुमार की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब; अंतरिम राहत बरकरार

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की उस याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया, जिसमें उन्होंने मनी लॉन्ड्रिंग कानून (PMLA) के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच को चुनौती दी है। अदालत ने केंद्र को इस मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश देते हुए यह भी साफ किया कि शिवकुमार को दंडात्मक कार्रवाई से मिली अंतरिम सुरक्षा फिलहाल जारी रहेगी।

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुदेजा की खंडपीठ ने इस याचिका पर सुनवाई की, जो 2022 से लंबित है। ईडी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने एक प्रारंभिक आपत्ति दर्ज कराई थी। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि याचिका में एक केंद्रीय अधिनियम (PMLA) को चुनौती दी गई है, इसलिए भारत सरकार को पक्षकार बनाए बिना इस पर सुनवाई नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने केंद्र को पक्षकार बनाने की अनुमति देते हुए जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया। हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि यह मामला दो साल से लंबित है और इसके मुख्य बिंदुओं को 2022 में ही चिन्हित कर लिया गया था।

सुनवाई के दौरान शिवकुमार को मिली अंतरिम राहत को लेकर ईडी और कोर्ट के बीच तल्खी देखी गई। जब कोर्ट ने अंतरिम सुरक्षा जारी रखने का निर्देश दिया, तो एएसजी राजू ने कहा कि वह शिवकुमार के खिलाफ कार्रवाई न करने के अपने पुराने बयान को वापस ले रहे हैं।

इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा किसी स्वैच्छिक बयान पर नहीं, बल्कि अदालत के आदेश पर आधारित है। बेंच ने टिप्पणी की, “जिस तरह से आदेश पारित किया गया है उसे देखें… अगले आदेश तक प्रतिवादी (ED) इससे बाध्य रहेगा। यह आपके कहने या न कहने पर निर्भर नहीं है।”

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कांग्रेस नेता डी.के. शिवकुमार ने 2022 में हाईकोर्ट का रुख किया था। उन्होंने 2020 में दर्ज प्रवर्तन मामले की सूचना रिपोर्ट (ECIR) और उन्हें जारी किए गए समन को रद्द करने की मांग की है। यह जांच सीबीआई द्वारा दर्ज किए गए आय से अधिक संपत्ति के एक कथित मामले से जुड़ी है।

शिवकुमार ने अपनी याचिका में कई कानूनी आधार रखे हैं:

  • डबल जियोपार्डी (दोहरा जोखिम): उनका आरोप है कि ईडी उसी अपराध की दोबारा जांच कर रही है जिसकी जांच वह 2018 के एक पिछले मामले में पहले ही कर चुकी है। उन्होंने इसे कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया है।
  • संवैधानिक वैधता: उन्होंने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (लोक सेवक द्वारा आपराधिक कदाचार) को पीएमएलए की अनुसूची में शामिल करने की वैधता को चुनौती दी है।
  • कानूनी दोहराव: याचिका में तर्क दिया गया है कि भ्रष्टाचार अधिनियम की धारा 13 अपने आप में एक ‘पूर्ण कोड’ है, इसलिए मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत अलग से जांच की आवश्यकता नहीं है।
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प्रवर्तन निदेशालय ने याचिका का कड़ा विरोध किया है। एजेंसी का कहना है कि दोनों ईसीआईआर अलग-अलग मामलों से संबंधित हैं।

  • 2018 का मामला आईपीसी की धारा 120बी के तहत दर्ज था, जिसमें 8.59 करोड़ रुपये का अपराध शामिल था।
  • वर्तमान जांच 74.93 करोड़ रुपये की आय से अधिक संपत्ति से जुड़ी है, जो 2013 से 2018 के बीच की अवधि की है।

ईडी ने तर्क दिया कि जांच के चरण में ‘डबल जियोपार्डी’ का तर्क देना जल्दबाजी है। साथ ही, किसी अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका के माध्यम से ‘अंतिम अग्रिम जमानत’ जैसी अंतरिम राहत देना गलत है।

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मामले की अगली सुनवाई 23 जुलाई को होगी।

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