सहकर्मी की पत्नी से अवैध संबंध पर बीएसएफ अधिकारी की बर्खास्तगी बरकरार: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा—“ऐसा आचरण अनुशासनहीन और देश की सुरक्षा के दायित्व के प्रतिकूल”


दिल्ली हाईकोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) के उस अधिकारी की बर्खास्तगी को बरकरार रखा है, जिस पर सहकर्मी की पत्नी से अवैध संबंध रखने का आरोप था। अदालत ने कहा कि ऐसा आचरण “अनुशासनहीन, अनैतिक और देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी के लिए घोर अनुपयुक्त” है।

 न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ ने पूर्व बीएसएफ सब-इंस्पेक्टर की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने 2022 में जनरल सिक्योरिटी फोर्स कोर्ट (GSFC) द्वारा दी गई सजा और बर्खास्तगी आदेश को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता ने अपनी सेवा बहाली की मांग की थी।

अदालत ने कहा कि वह “ऐसे संस्थागत और नैतिक सिद्धांतों के उल्लंघन पर आंखें मूंद नहीं सकती” क्योंकि “ऐसा बेईमान व्यवहार सशस्त्र बलों की ईमानदारी और जनविश्वास को कमजोर करता है।”

खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता का आचरण—सहकर्मी की पत्नी से बार-बार मिलना और उसे उपहार देना—“नैतिक रूप से निंदनीय” है और “हर नागरिक के विवेक के प्रतिकूल” है। अदालत ने कहा कि अनुशासित बलों के सदस्य से उच्चतम स्तर की ईमानदारी और मर्यादा की अपेक्षा की जाती है।

“हम याचिकाकर्ता के आचरण से आंखें नहीं मूंद सकते, जो न केवल अपमानजनक है बल्कि ऐसे अधिकारी के लिए अनुपयुक्त भी है जिसे देश की रक्षा जैसे गंभीर दायित्व सौंपे गए हैं,” अदालत ने कहा।

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अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारी इस बात का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका कि उसने महिला को मोबाइल फोन, सोने का लॉकेट और कपड़े जैसे उपहार क्यों दिए। जीएसएफसी ने पाया था कि ये वस्तुएं “गुप्त रूप से” दी गई थीं और यह कि ये उपहार “यौन संबंधों के बदले” दिए गए थे।

“अगर याचिकाकर्ता ने ये वस्तुएं पैसे के बदले दी होतीं तो वह ‘मिसेज एक्स’ के पति को बता सकता था और राशि वापस ले सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया,” अदालत ने कहा।

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मामला 2019 का है, जब महिला के पति ने शिकायत की थी कि अधिकारी का उसकी पत्नी के साथ अनुचित संबंध है। महिला ने अपने बयान में कहा कि उसने पहले अधिकारी से बातचीत से परहेज किया, लेकिन बाद में उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया।

बीएसएफ ने जांच करवाई और 2022 में जीएसएफसी ने अधिकारी को दोषी पाकर सेवा से बर्खास्त कर दिया।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि महिला का बयान दबाव में लिया गया था और कोई ठोस सबूत नहीं है, परंतु अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि जीएसएफसी का निर्णय साक्ष्यों पर आधारित है और उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

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अदालत ने कहा कि अनुशासित बलों के सदस्यों को उच्च नैतिक और चारित्रिक मानकों का पालन करना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता का आचरण उस वर्दी की गरिमा के अनुरूप नहीं था जिसे वह पहनता था।

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