दिल्ली हाईकोर्ट ने एक नाबालिग लड़के के साथ अप्राकृतिक कृत्य और ‘गैंग पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ के मामले में दो आरोपियों की सजा में संशोधन किया है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई 15 साल की सजा को घटाकर 10 साल के कठोर कारावास में बदल दिया है। कोर्ट ने माना कि पीड़ित की गवाही विश्वसनीय और मेडिकल रिपोर्ट द्वारा समर्थित थी, हालांकि जांच अधिकारी (IO) द्वारा जैविक नमूनों (Biological Samples) की हैंडलिंग में “कर्तव्य की स्पष्ट लापरवाही” (Clear dereliction of duty) पाई गई।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 415(2) के तहत दायर अपीलों पर सुनवाई करते हुए जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने आरोपी नवदीप उर्फ सोनू और कृष्ण की दोषसिद्धि को बरकरार रखा। कोर्ट ने सजा में कमी करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों और घटना के समय आरोपियों की कम उम्र को आधार बनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह मामला 23 जून 2017 को दर्ज किया गया था। बवाना के राजीव गांधी स्टेडियम में कबड्डी खेलने वाले एक नाबालिग पीड़ित ने आरोप लगाया कि उसके सीनियर खिलाड़ी नवदीप और कृष्ण पिछले एक साल से उसका यौन उत्पीड़न कर रहे थे। पीड़ित का कहना था कि आरोपी एक कथित अश्लील वीडियो के जरिए उसे ब्लैकमेल करते थे।
अंतिम घटना के दिन, आरोपी उसे एक कमरे में ले गए जहाँ नवदीप ने उसके साथ पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट किया, जबकि कृष्ण कमरे के बाहर अपनी बारी का इंतजार कर रहा था। पीड़ित के रोने पर आरोपियों ने उसे जाने दिया। घर लौटने पर जब पीड़ित की मां ने उसके गाल पर चोट का निशान देखा, तब उसने पूरी घटना की जानकारी दी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि ब्लैकमेल के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले वीडियो की कभी बरामदगी नहीं हुई, जिससे पूरी कहानी संदिग्ध लगती है। उन्होंने यह भी कहा कि कबड्डी प्रैक्टिस के दौरान हुए पुराने झगड़े के कारण आरोपियों को झूठा फंसाया गया है। बचाव पक्ष ने जांच में देरी और मेडिकल साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए कहा कि पीड़ित की मां ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर गलत मेडिकल रिपोर्ट तैयार करवाई।
दूसरी ओर, राज्य के वकील (APP) ने दलील दी कि पीड़ित की गवाही पूरी तरह से सुसंगत है और उसे उसकी मां के बयान और मेडिकल जांच से मजबूती मिलती है। मेडिकल रिपोर्ट में ‘मल्टीपल इरोजन्स’ और गाल पर दांत के निशान का जिक्र था, जो अभियोजन के मामले की पुष्टि करते हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्य और पीड़ित की गवाही के अंतर्संबंधों का विस्तार से विश्लेषण किया। सोलंकी चिमनभाई उकाभाई बनाम गुजरात राज्य मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि मेडिकल साक्ष्य केवल सहायक (corroborative) होते हैं और वे चश्मदीद की विश्वसनीय गवाही को तब तक खारिज नहीं कर सकते जब तक कि वे घटना की संभावना को पूरी तरह से नकार न दें।
मेडिकल रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“गंभीर चोटों की अनुपस्थिति या सामान्य ‘एनल टोन’ (Anal Tone) का होना अपने आप में यौन हमले की संभावना को खारिज नहीं करता है, विशेष रूप से तब जब जांच में ‘मल्टीपल इरोजन्स’ जैसे अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए हों।”
कोर्ट ने जांच में खामियों पर गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने नोट किया कि पीड़ित के कपड़ों पर कृष्ण (A1) का DNA पाया जाना, जबकि पीड़ित ने उस दिन केवल नवदीप (A2) द्वारा कृत्य किए जाने की बात कही थी, साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की ओर इशारा करता है। कोर्ट ने कहा:
“मौजूदा मामले में, जांच अधिकारी (IO) द्वारा कर्तव्य की स्पष्ट लापरवाही दिखाई देती है। मामले को साबित करने की अपनी उत्सुकता में, IO ने नमूनों (Samples) के साथ छेड़छाड़ की प्रतीत होती है।”
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच में हुई खामियों का लाभ आरोपियों को तब तक नहीं मिल सकता जब तक कि पीड़ित की गवाही स्वतंत्र रूप से विश्वसनीय हो। कृष्ण (A1) की जिम्मेदारी तय करते हुए कोर्ट ने POCSO एक्ट की धारा 5(g) के स्पष्टीकरण का उपयोग किया और कहा कि ‘कॉमन इंटेंशन’ के साथ मौजूदगी के कारण उसे भी ‘गैंग पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ का दोषी माना जाएगा।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377/34 और POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी माना।
सजा के बिंदु पर, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रविंदर सिंह बनाम दिल्ली सरकार (2024) मामले का संदर्भ दिया। कोर्ट ने पाया कि संबंधित अपराध के लिए उस समय अधिकतम सजा 14 साल (यदि आजीवन कारावास न दिया गया हो) हो सकती थी।
“इसके अलावा, घटना के समय अपीलकर्ता केवल 19-20 वर्ष के थे। इन परिस्थितियों को देखते हुए, मेरा मानना है कि 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा न्याय के उद्देश्यों को पूरा करेगी।”
कोर्ट ने अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सजा को 15 साल से घटाकर 10 साल कर दिया।
मामले का विवरण
- केस टाइटल: नवदीप @ सोनू बनाम राज्य (NCT दिल्ली) एवं कृष्ण बनाम राज्य (NCT दिल्ली)
- केस नंबर: CRL.A. 23/2025 और CRL.A. 47/2025
- बेंच: जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा
- फैसले की तारीख: 24 मार्च, 2026

