किरायेदारी और वैकल्पिक संपत्ति पर विरोधाभासी बयानों ने बढ़ाई मकान मालिक की मुश्किलें: दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की पुनरीक्षण याचिका

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि मकान मालिक किरायेदार की पहचान और अपने पास उपलब्ध अन्य संपत्तियों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं कर पाता है, तो किरायेदार को बेदखली के खिलाफ बचाव (Leave to Defend) का अधिकार मिलना स्वाभाविक है।

हाईकोर्ट ने एक मकान मालिक की पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को खारिज करते हुए कहा कि किरायेदार का एक ‘साझेदारी फर्म’ (Partnership Firm) होना और मकान मालिक के पास वैकल्पिक संपत्ति की उपलब्धता जैसे मुद्दे ‘विचारणीय मुद्दे’ (Triable Issues) हैं, जिनका फैसला केवल सुनवाई (Trial) के दौरान ही हो सकता है।

क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता, श्रीमती मीनू चौरसिया ने दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 की धारा 14(1)(e) के तहत बेदखली की याचिका दायर की थी। उनका दावा था कि उन्होंने 19 सितंबर 2012 को रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए संपत्ति (588, गली बाल मुकुंद, बाजार सीताराम, दिल्ली) खरीदी थी।

याचिकाकर्ता ने ‘वास्तविक आवश्यकता’ (Bona fide Requirement) का हवाला देते हुए कहा कि वह एक विधवा हैं और कोरोना महामारी के दौरान उनके बेटे की नौकरी चली गई थी। बेटे का व्यवसाय शुरू करने के लिए उन्हें इस दुकान की सख्त जरूरत है और दिल्ली में उनके पास कोई अन्य वैकल्पिक जगह मौजूद नहीं है।

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किरायेदार का पलटवार: “असली किरायेदार मैं नहीं, फर्म है”

प्रतिवादी अंकित गुप्ता ने बेदखली याचिका का विरोध करते हुए एक अहम कानूनी पेंच फंसाया। उन्होंने तर्क दिया कि यह याचिका उनके खिलाफ व्यक्तिगत क्षमता में गलत तरीके से दायर की गई है। उनका कहना था कि असली किरायेदार वह नहीं, बल्कि एक साझेदारी फर्म “मैसर्स बिशंभर नाथ हेम चंद” है।

इसके अलावा, प्रतिवादी ने कोर्ट को बताया कि मकान मालिक ने अपनी अन्य संपत्तियों की जानकारी छिपाई है। उन्होंने दावा किया कि मकान मालिक के पास ‘गली लेहस्वा’ स्थित एक अन्य संपत्ति के ग्राउंड फ्लोर पर चार दुकानें खाली पड़ी हैं।

निचली अदालत (एडिशनल रेंट कंट्रोलर) ने इन तर्कों को गंभीर मानते हुए 22 जनवरी 2024 को किरायेदार को ‘लीव टू डिफेंड’ दे दी थी, जिसके खिलाफ मकान मालिक ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

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हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: “दो नावों पर सवारी की कोशिश”

न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि मकान मालिक के बयानों में भारी विरोधाभास है। कोर्ट ने गौर किया कि मकान मालिक द्वारा पेश की गई सेल डीड और रेंट रसीद में भी किरायेदार के रूप में “मैसर्स बिशंभर नाथ हेम चंद” का नाम दर्ज था।

जब मकान मालिक ने तर्क बदला कि प्रतिवादी भी उस फर्म का पार्टनर है, तो कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा:

“साफ है कि याचिकाकर्ता अपनी कमियों को छिपाने के लिए अपने वास्तविक केस को बदलकर दो नावों पर सवार होने की कोशिश कर रही हैं।”

कोर्ट ने माना कि जब किरायेदार के अस्तित्व (व्यक्तिगत बनाम फर्म) पर ही विवाद है, तो यह एक विचारणीय मुद्दा है।

वैकल्पिक संपत्ति पर चुप्पी पड़ी भारी

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हाईकोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि मकान मालिक ने कभी भी किरायेदार के उस दावे का खंडन नहीं किया, जिसमें कहा गया था कि उनके पास ‘गली लेहस्वा’ में चार दुकानें खाली हैं। कोर्ट ने कहा कि वैकल्पिक आवास की उपलब्धता पर संदेह के बादल हैं, जो एक ट्राइबल इश्यू को जन्म देता है।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट के सरला आहूजा और आबिद-उल-इस्लाम के फैसलों का हवाला देते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत का फैसला बिल्कुल सही था। चूंकि मामले में तथ्य और सबूतों की जांच जरूरी है, इसलिए मकान मालिक की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई।

केस का विवरण:

  • केस टाइटल: श्रीमती मीनू चौरसिया बनाम श्री अंकित गुप्ता
  • केस नंबर: RC.REV. 175/2024
  • कोरम: न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी

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