दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि भर्ती के समय भरे जाने वाले अटेस्टेशन फॉर्म में लंबित आपराधिक मामले की जानकारी छिपाना एक प्रोबेशनर (परिवीक्षाधीन कर्मचारी) की सेवा समाप्त करने का वैध आधार है। जस्टिस संजीव नरूला ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के एक बैंक गार्ड द्वारा अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि “डीम्ड कन्फर्मेशन” (स्वचालित स्थायीकरण) के सिद्धांत का लाभ उस कर्मचारी को नहीं दिया जा सकता जिसने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया हो, विशेषकर तब जब नियुक्ति पत्र में स्थायीकरण को पूर्ववृत्त सत्यापन (antecedent verification) के संतोषजनक होने के अधीन रखा गया हो।
कानूनी मुद्दा
इस मामले का मुख्य कानूनी बिंदु यह था कि क्या कोई प्रोबेशनर छह महीने की सेवा पूरी करने के बाद स्वतः स्थायी होने का दावा कर सकता है, भले ही उसने भर्ती के समय अपने आपराधिक रिकॉर्ड के बारे में गलत जानकारी दी हो। कोर्ट ने शास्त्री अवार्ड के “डीम्ड कन्फर्मेशन” क्लॉज और नियुक्ति पत्र की विशिष्ट शर्तों के बीच के कानूनी तालमेल पर विचार किया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता राजकिरण यादव, जो एक पूर्व सैनिक हैं, को 27 जून 2022 को SBI द्वारा बैंक गार्ड के रूप में नियुक्त किया गया था। नियुक्ति पत्र के अनुसार उन्हें छह महीने के प्रोबेशन पर रखा गया था और यह स्पष्ट किया गया था कि उनका स्थायीकरण “पुलिस अधिकारियों से आपके चरित्र और पूर्ववृत्त की संतोषजनक रिपोर्ट प्राप्त होने” के अधीन होगा।
भर्ती प्रक्रिया के दौरान, याचिकाकर्ता ने बायो-डाटा-कम-अटेस्टेशन फॉर्म में लंबित आपराधिक मामलों से जुड़े सवाल के जवाब में “No” लिखा था। हालांकि, दिसंबर 2022 में प्राप्त पुलिस सत्यापन रिपोर्ट से पता चला कि बैंक ज्वाइन करने के समय याचिकाकर्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 323/341/506/34 के तहत प्राथमिकी (FIR No. 129/2014) लंबित थी। इसके बाद बैंक ने कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए 9 अगस्त 2023 को शास्त्री अवार्ड के पैरा 522(1) के तहत उनकी सेवा समाप्त कर दी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की दलीलें: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि सेवा समाप्ति का नोटिस जारी होने तक याचिकाकर्ता छह महीने से अधिक की सेवा पूरी कर चुके थे और शास्त्री अवार्ड के क्लॉज 495 के तहत उन्हें एक स्थायी कर्मचारी माना जाना चाहिए। उन्होंने दलील दी कि एक स्थायी कर्मचारी होने के नाते बैंक उनकी सेवा केवल नोटिस देकर समाप्त नहीं कर सकता था, बल्कि कथित कदाचार के लिए पूरी विभागीय जांच (departmental inquiry) अनिवार्य थी।
प्रतिवादी (बैंक) की दलीलें: SBI ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता प्रोबेशनर ही बने रहे क्योंकि उनका स्थायीकरण स्पष्ट रूप से संतोषजनक पुलिस रिपोर्ट पर निर्भर था। बैंक का कहना था कि लंबित आपराधिक मामले को छिपाना “भर्ती मानकों का गंभीर उल्लंघन” है। बैंक ने सुप्रीम कोर्ट के सतीश चंद्र यादव बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का हवाला देते हुए कहा कि उपयुक्तता के आकलन के लिए सत्यनिष्ठा अनिवार्य है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के स्वचालित स्थायीकरण के दावे को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति पत्र ही सेवा की शर्तों को निर्धारित करने वाला मुख्य दस्तावेज है और इसमें स्थायीकरण को पुलिस रिपोर्ट के संतोषजनक होने के अधीन रखा गया था। जस्टिस नरूला ने कहा:
“ये कोई मामूली शर्तें नहीं हैं। ये उन शर्तों के मूल में हैं जिन पर याचिकाकर्ता को सेवा में लिया गया था। ये स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि स्थायीकरण केवल समय बीतने के साथ स्वतः होने वाला परिणाम नहीं था। यह पूर्ववृत्त के संतोषजनक सत्यापन और बैंक के निर्णय पर निर्भर था।”
आपराधिक मामले को छिपाने पर कोर्ट ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता का बाद में बरी होना (दिसंबर 2022) भर्ती के समय सच न बताने की विफलता को खत्म नहीं करता। कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और सच्चाई के महत्व पर जोर देते हुए कहा:
“लंबित आपराधिक मामले के बारे में सही जानकारी देना बैंक की नौकरी में पूर्ववृत्त सत्यापन का हिस्सा है। नियोक्ता यह तय करते समय कि किसी प्रोबेशनर की सेवा को स्थायी किया जाए या समाप्त, इस जानकारी को छिपाने के तथ्य को महत्व देने का हकदार है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता ने स्थायी कर्मचारी का दर्जा प्राप्त नहीं किया था, इसलिए बैंक कानूनी रूप से एक प्रोबेशनर के रूप में उनकी सेवा समाप्त करने के लिए स्वतंत्र था।
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने बैंक के निर्णय में कोई कानूनी खामी नहीं पाई और रिट याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता द्वारा गलत जानकारी दिए जाने के कारण उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाना और सेवा समाप्त करना बैंक का उचित निर्णय था।
केस विवरण:
केस टाइटल: राजकिरण यादव बनाम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया थ्रू इट्स चीफ जनरल मैनेजर एवं अन्य
केस नंबर: W.P.(C) 11860/2023, CM APPL. 46295/2023
बेंच: जस्टिस संजीव नरूला
तारीख: 20 अप्रैल, 2026

