निष्पादन कार्यवाही में सक्रियता ‘पर्याप्त कारण’ नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने 1500 दिनों की देरी के आधार पर अपील खारिज की

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्यवस्था दी है कि यदि कोई पक्षकार डिक्री के निष्पादन (Execution) की कार्यवाही में सक्रिय रूप से भाग ले रहा है, तो वह अपील दायर करने में हुई अत्यधिक देरी को माफ करने के लिए ‘पर्याप्त कारण’ (Sufficient Cause) का दावा नहीं कर सकता।

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने हीरा देवी (मृतक) के कानूनी वारिसों द्वारा दायर नियमित द्वितीय अपील (RSA) को खारिज करते हुए कहा कि एक याचिकाकर्ता जो कोर्ट के समक्ष “चयनात्मक रूप से सक्रिय” (Selectively Active) रहता है—अर्थात निष्पादन कार्यवाही का जवाब तो देता है लेकिन मूल डिक्री को चुनौती नहीं देता—वह कानूनन देरी की माफी का हकदार नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला कालकाजी स्थित एक डीडीए स्लम फ्लैट के कब्जे और घोषणा (Possession and Declaration) से संबंधित था। मूल वादी हीरा देवी ने दावा किया था कि 27 मार्च 2000 के दस्तावेज फर्जी हैं। ट्रायल कोर्ट ने 19 अप्रैल 2017 को इस मुकदमे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह परिसीमा (Limitation) द्वारा वर्जित है क्योंकि वादी को वर्ष 2000 से ही उन दस्तावेजों की जानकारी थी।

इसके बाद, प्रतिवादियों ने अक्टूबर 2017 में निष्पादन याचिका दायर की। अपीलकर्ता ने 2018 के दौरान निष्पादन कार्यवाही में कई बार भाग लिया, लेकिन 19 अप्रैल 2017 के फैसले के खिलाफ अपील 4 सितंबर 2021 को तब दायर की, जब उसे कोर्ट बेलीफ द्वारा संपत्ति से बेदखल कर दिया गया।

पक्षकारों के तर्क

अपीलकर्ता ने 1589 दिनों की देरी को माफ करने की मांग करते हुए तर्क दिया कि:

  • ट्रायल कोर्ट का फैसला “स्पष्ट रूप से अवैध” था क्योंकि उसने कब्जे के मुकदमे में 12 साल के बजाय 3 साल की परिसीमा अवधि लागू की।
  • अपीलकर्ता एक वरिष्ठ नागरिक थी जो गंभीर बीमारियों और वित्तीय कठिनाइयों से जूझ रही थी, और कोविड-19 महामारी ने स्थिति को और खराब कर दिया था।
  • निष्पादन कार्यवाही में बचाव करना अपील करने के वैधानिक अधिकार का परित्याग नहीं माना जा सकता।
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प्रतिवादियों ने दलील दी कि अपीलकर्ता 2017 से ही डिक्री से पूरी तरह अवगत थी और वर्षों तक निष्पादन का विरोध किया, जिससे यह सिद्ध होता है कि अपील समय पर न करने के पीछे कोई “पर्याप्त कारण” नहीं था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने देरी के आधारों और अपीलकर्ता के आचरण की समीक्षा की। चिकित्सा और वित्तीय अक्षमता के दावे पर कोर्ट ने नोट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है जो यह साबित करे कि अपीलकर्ता इतनी बीमार थी कि वह अपील दायर नहीं कर सकती थी।

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जस्टिस कृष्णा ने अपीलकर्ता की निष्पादन कोर्ट में उपस्थिति (फरवरी, मार्च और सितंबर 2018) का उल्लेख करते हुए कहा:

“निष्पादन कार्यवाही में भाग लेने के बावजूद, उसने अपील न करने का विकल्प चुना। वह न केवल डिक्री से अवगत था, बल्कि उसने 18.03.2021 को कब्जा वापस लिए जाने तक इसका विरोध भी किया। यदि वह निष्पादन कार्यवाही लड़ सकता था, तो ऐसा कोई कारण नहीं है कि वह समय पर अपील क्यों नहीं कर सका।”

कोविड-19 महामारी के तर्क पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपील दायर करने की 90 दिनों की अवधि महामारी शुरू होने से बहुत पहले ही समाप्त हो गई थी। कोर्ट ने बसंतराज बनाम भूमि अधिग्रहण अधिकारी (2013) मामले में सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा:

“यदि किसी वादकारी को समय पर अदालत पहुंचने से रोकने के लिए कोई पर्याप्त कारण नहीं था, तो बिना किसी औचित्य के देरी को माफ करना विधायिका के प्रति पूर्ण उपेक्षा दिखाने के समान है।”

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता केवल निष्पादन मामलों के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा रही थी, जबकि अपील की वैधानिक समय सीमा की अनदेखी की गई।

न्यायालय का निर्णय

हाईकोर्ट ने जिला न्यायाधीश के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि अपीलकर्ता सावधानी और तत्परता से कार्य करने में विफल रही। कोर्ट के अनुसार, निष्पादन कार्यवाही में सक्रिय भाग लेने के बाद कब्जा छिन जाने पर अपील दायर करना केवल एक तकनीकी आधार पर न्याय की प्रक्रिया को बाधित करना है। इसी के साथ हाईकोर्ट ने नियमित द्वितीय अपील को गुण-दोष के आधार पर विचार किए बिना खारिज कर दिया।

  • केस शीर्षक: हीरा देवी (मृतक) कानूनी वारिसों के माध्यम से बनाम पुष्पा देवी और अन्य
  • केस संख्या: RSA 13/2026 एवं CM APPL. 3665/2026

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