दिल्ली हाईकोर्ट ने कोर्ट क्लर्क की आत्महत्या मामले में FIR दर्ज करने से किया इनकार; कहा- कार्यपालक मजिस्ट्रेट की जांच जारी

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को साकेत कोर्ट परिसर में आत्महत्या करने वाले 43 वर्षीय प्रशासनिक क्लर्क हरीश सिंह महार की मौत के मामले में इस स्तर पर FIR दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि इस “दुर्भाग्यपूर्ण घटना” की जांच भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 194 के तहत कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष चल रही है और रिपोर्ट की प्रतीक्षा की जा रही है।

मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ‘आनंद लीगल एड फोरम ट्रस्ट’ द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें घटना की जांच के लिए FIR दर्ज करने और दिल्ली की जिला अदालतों में क्लर्कों की रिक्तियों को शीघ्र भरने की मांग की गई थी।

हरीश सिंह महार, जो कि एक अहलमद (प्रशासनिक क्लर्क) थे, ने 9 जनवरी को साकेत कोर्ट परिसर की एक इमारत से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। पुलिस को उनके पास से एक सुसाइड नोट भी मिला बताया गया है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि वे कार्यभार के दबाव में थे और विकलांगता की स्थिति में भी चार बार ट्रांसफर का अनुरोध कर चुके थे।

अदालत ने कहा कि इस घटना के बाद “तुरंत कार्रवाई की गई” और पीड़ित परिवार को कानूनी प्रावधानों के अनुसार राहत दी गई है।

खंडपीठ ने कहा, “हमने तत्काल कार्रवाई की। किसी भी स्तर पर कोई कमी नहीं रही। आगे की कार्रवाई कार्यपालक मजिस्ट्रेट की जांच रिपोर्ट पर निर्भर करेगी। वर्तमान स्थिति में FIR के निर्देश देने का कोई औचित्य नहीं बनता।”

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याचिका में यह भी कहा गया कि दिल्ली की जिला अदालतों में 3,000 से अधिक क्लर्क पद रिक्त हैं, जिससे मौजूदा स्टाफ पर अत्यधिक कार्यभार पड़ता है।

इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक स्तर पर स्टाफ की स्थिति, रिक्तियों और कार्यवितरण का ऑडिट चल रहा है।

अदालत ने भरोसा दिलाया, “हमें कोई संदेह नहीं है कि बहुत कम समय में इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे और रिक्तियों को प्राथमिकता के आधार पर भरा जाएगा।”

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि दिवंगत क्लर्क पर 3,000 फाइलों का बोझ था, जिससे उन्हें मानसिक दबाव झेलना पड़ा। इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि यह दावा “जनता का ध्यान खींचने” वाला है और तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।

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अदालत ने कहा कि हरीश सिंह महार को नवंबर 2023 में ही अहलमद के पद पर पदोन्नति मिली थी और उससे पहले वे अधिक श्रमसाध्य कार्य संभाल रहे थे। साथ ही बताया कि वे पूरी तरह डिजिटाइज्ड ट्रैफिक कोर्ट में कार्यरत थे, जहां कार्यप्रणाली पारंपरिक अदालतों से अलग होती है।

अब इस मामले में आगे की कार्रवाई कार्यपालक मजिस्ट्रेट की जांच रिपोर्ट पर निर्भर करेगी। कोर्ट ने संकेत दिया कि आवश्यकता होने पर आगे उचित निर्देश दिए जा सकते हैं।

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