BNS की धारा 79 के तहत महिला की लज्जा को ठेस पहुँचाने का अपराध: ‘कोई भी महिला’ शब्द में महिलाओं का पहचान योग्य वर्ग भी शामिल, केवल एक नामज़द व्यक्ति तक सीमित नहीं: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने जस्टिस जी.के. इलन्थिरैयन की पीठ द्वारा दिए गए एक आदेश में स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 79 के तहत महिला की लज्जा को ठेस पहुँचाने के अपराध में प्रयुक्त ‘कोई भी महिला’ (any woman) अभिव्यक्ति केवल किसी एक नामज़द व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के किसी भी पहचान योग्य और निश्चित वर्ग या समूह पर भी लागू होती है। इस कानूनी सिद्धांत के आधार पर, हाईकोर्ट ने राजनीतिक विश्लेषक डॉ. पोनराज की उन दो आपराधिक मूल याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें उन्होंने एक ऑनलाइन साक्षात्कार के दौरान तमिझगा वेत्री कज़गम राजनीतिक दल की महिला सदस्यों के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणी करने के मामले में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) को रद्द करने की मांग की थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 18 मार्च 2026 को ‘किंग 360’ यूट्यूब चैनल पर प्रसारित एक साक्षात्कार के संबंध में डॉ. पोनराज के खिलाफ दर्ज दो अलग-अलग शिकायतों से उत्पन्न हुआ था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, याचिकाकर्ता ने तमिझगा वेत्री कज़गम पार्टी की महिला कार्यकर्ताओं को सामूहिक रूप से वेश्या और अनपढ़ (‘तटकुरी’) कहकर संबोधित किया था और उन्हें बेनकाब करने के लिए पार्टी नेता का धन्यवाद करते हुए अपमानजनक व निंदात्मक टिप्पणियां की थीं।

पहली एफआईआर (अपराध संख्या 59/2026) तिरुपराकुंडरम निर्वाचन क्षेत्र के विधायक, तमिझगा वेत्री कज़गम के संयुक्त महासचिव और तमिलनाडु सरकार के ऊर्जा संसाधन व कानून मंत्री निर्मल कुमार की शिकायत पर दर्ज की गई थी। इसमें याचिकाकर्ता पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 79 और 296(b) तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67 के तहत आरोप लगाए गए थे।

दूसरी एफआईआर (अपराध संख्या 194/2026) कुड्डालोर निर्वाचन क्षेत्र के विधायक और तमिलनाडु सरकार के आवास एवं शहरी विकास मंत्री राज कुमार की शिकायत पर दर्ज की गई थी। इस एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 79 और 353(1)(c), तमिलनाडु महिला उत्पीड़न निषेध (संशोधन) अधिनियम, 2002 की धारा 4 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67 को शामिल किया गया था।

जांच के दौरान, पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 180(3) के तहत गवाह टीएमटी डी. गीधा भानुप्रिया का बयान दर्ज किया। उन्होंने अपने बयान में कहा कि याचिकाकर्ता की टिप्पणियों से पार्टी की महिला कार्यकर्ताओं और पूरे तमिलनाडु की महिलाओं की गरिमा, चरित्र और स्वाभिमान को ठेस पहुंची है।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन.आर. एलांगो ने तर्क दिया कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों से पहली नज़र में कोई अपराध सिद्ध नहीं होता और यह आपराधिक कार्यवाही राजनीतिक रूप से प्रेरित व दुर्भावनापूर्ण मंशा से शुरू की गई है। उन्होंने अदालत को बताया कि डॉ. पोनराज एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, सार्वजनिक नीति सलाहकार, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के कार्यकाल में राष्ट्रपति सचिवालय में निदेशक (प्रौद्योगिकी इंटरफेस) और लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA-तेजस) कार्यक्रम में पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक रह चुके हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि शिकायतों में साक्षात्कार से एक शब्द को संदर्भ से बाहर निकालकर पेश किया गया है। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता ने 27 मार्च 2026 को पुलिस आयुक्त को एक लिखित स्पष्टीकरण भेजा था और बाद में यूट्यूब से वह वीडियो भी हटा दिया गया था। इसके अलावा, उन्होंने तर्क दिया कि धारा 79 BNS के तहत किसी विशिष्ट महिला को अपमानित करने का इरादा होना आवश्यक है, जबकि याचिकाकर्ता ने किसी विशेष व्यक्ति के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की थी।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय इमरान प्रतापगढ़ी बनाम गुजरात राज्य (2026) का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस ने BNSS की धारा 173(3) के तहत प्रारंभिक जांच किए बिना ही यांत्रिक तरीके से एफआईआर दर्ज कर ली। उन्होंने एस. खुशबू बनाम कनियाम्माल (2010) के मामले का भी उल्लेख किया।

राज्य और शिकायतकर्ताओं के वकीलों ने याचिकाओं का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने राजनीतिक दल की महिला कार्यकर्ताओं को वेश्या और अनपढ़ बताकर जानबूझकर अपमानजनक बयान दिए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि महिला कार्यकर्ता एक पहचान योग्य वर्ग हैं जो इन टिप्पणियों से व्यथित हुई हैं, और इस मामले में धारा 79 BNS तथा धारा 67 आईटी एक्ट के तहत अपराध स्पष्ट रूप से आकर्षित होते हैं।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 79 के दायरे पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि इस अपराध को आकर्षित करने के लिए यह पर्याप्त है कि किसी व्यक्ति ने महिला की लज्जा को ठेस पहुंचाने के इरादे से शब्द कहे हों। अदालत ने स्पष्ट रूप से निर्णय दिया कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 79 में प्रयुक्त ‘कोई भी महिला’ शब्द केवल किसी एक नामज़द व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यदि कहे गए शब्द महिलाओं के किसी पहचान योग्य और निश्चित वर्ग या समूह से संबंधित हैं और उन पर लक्षित हैं, तो यह पर्याप्त है।

हाईकोर्ट ने माना कि पंजीकृत राजनीतिक दल की महिला कार्यकर्ता ऐसा ही एक पहचान योग्य और निश्चित वर्ग बनाती हैं। याचिकाकर्ता की पृष्ठभूमि के संबंध में अदालत ने कहा कि वैज्ञानिक प्रतिष्ठा और सार्वजनिक स्थिति वाले व्यक्ति पर सार्वजनिक चर्चा में महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियों से बचने की अधिक जिम्मेदारी होती है। संज्ञेय अपराध के आरोप सामने आने पर ऐसी स्थिति को एफआईआर रद्द करने के बचाव के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि पुलिस को दिया गया लिखित स्पष्टीकरण या यूट्यूब से वीडियो का हटाया जाना, कथित अपराध के घटित होने को समाप्त या अमान्य नहीं करता है। इसके अलावा, चूंकि यह भाषण यूट्यूब पर इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रसारित किया गया था, इसलिए प्रथम दृष्टया आईटी एक्ट की धारा 67 के प्रावधान भी लागू होते हैं।

एस. खुशबू मामले के निर्णय को अलग करते हुए अदालत ने कहा कि वह इस मामले में लागू नहीं होता क्योंकि वर्तमान शिकायतें महिलाओं के एक पहचान योग्य वर्ग के खिलाफ आरोपों पर आधारित हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों सौ. कमल शिवाजी पोकारनेकर बनाम महाराष्ट्र राज्य (2019) और मेसर्स नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य (2021) का संदर्भ देते हुए जस्टिस जी.के. इलन्थिरैयन ने पुनः दोहराया कि एफआईआर दर्ज होने के स्तर पर अदालत को केवल यह देखना होता है कि लगाए गए आरोपों से कोई संज्ञेय अपराध प्रकट होता है या नहीं और शुरुआती चरण में आपराधिक कार्यवाही को बाधित नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों से प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, जिसकी विस्तृत जांच आवश्यक है। नतीजतन, अदालत ने दोनों आपराधिक मूल याचिकाओं (क्रिमिनल ओरिजिनल पेटिशन नंबर 15258 और 15446/2026) को खारिज कर दिया और उनसे जुड़ी विविध याचिकाओं को भी बंद कर दिया।

अदालत ने पुलिस निरीक्षक, सीसीबी, साइबर क्राइम विंग, चेन्नई को निर्देश दिया कि वे दोनों मामलों में जांच पूरी करें और इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से 12 सप्ताह के भीतर सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: डॉ. पोनराज बनाम राज्य, प्रतिनिधि- पुलिस निरीक्षक, सीसीबी, साइबर क्राइम विंग, चेन्नई एवं अन्य
वाद संख्या: आपराधिक मूल याचिका संख्या 15258 और 15446/2026
पीठ: जस्टिस जी.के. इलन्थिरैयन
निर्णय की तिथि: 17 जुलाई 2026

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