हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने हिंदू देवी-देवताओं और संतों के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री वाली किताबें बेचने के आरोपी दुकानदारों के खिलाफ चल रही ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई को रद्द कर दिया है। अदालत ने राज्य या केंद्र सरकार से अनिवार्य कानूनी मंजूरी न मिलने के कारण यह फैसला लिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने नालागढ़ पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर को खारिज करने से साफ इनकार कर दिया है और स्पष्ट किया है कि आवश्यक स्वीकृति मिलने के बाद राज्य सरकार दोबारा कानूनी प्रक्रिया शुरू कर सकती है।
मंजूरी के बिना सुनवाई का अधिकार नहीं
17 जुलाई को सुनाए गए अपने आदेश में जस्टिस राकेश कैंथला ने स्पष्ट किया कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने से जुड़े मामलों में भारतीय दंड संहिता के तहत मुकदमा चलाने के लिए जिला मजिस्ट्रेट, राज्य सरकार या केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है। अभियोजन पक्ष द्वारा मुकदमा शुरू होने से पहले यह मंजूरी हासिल नहीं की गई थी, जिसके कारण ट्रायल कोर्ट के पास इस मामले का संज्ञान लेने का क्षेत्राधिकार नहीं था।
एफआईआर रद्द न करने का आधार
अदालत ने कहा कि हिंदू धर्म के पूजनीय देवी-देवताओं और संतों के प्रति अपमानजनक बातें कहना पहली नज़र में किसी वर्ग की धार्मिक आस्थाओं को आहत करने के इरादे को दर्शाता है। इसलिए, इस स्तर पर एफआईआर को खत्म करना उचित नहीं होगा। हाईकोर्ट के अनुसार, ज़ब्त की गई किताबों की जांच ट्रायल कोर्ट करेगी और वही यह तय करेगी कि उनमें लिखी बातें न्यायसंगत थीं या नहीं। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है और यह सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है।
किताबों की बिक्री और पुलिस जांच
यह पूरा विवाद सोलन जिले के नालागढ़ का है, जहां एक व्यक्ति ने कुछ किताबें खरीदी थीं। शिकायतकर्ता का आरोप था कि ‘हिंदू धर्म महान’ नामक किताब में हिंदू देवी-देवताओं और संतों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां की गई हैं। शिकायत के आधार पर नालागढ़ पुलिस ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की धाराओं में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की थी।
पुलिस ने कार्रवाई करते हुए ‘हिंदू धर्म महान’, ‘गीता तेरा ज्ञान अमृत’, ‘कबीर परमेश्वर’, ‘जीने की राह’ और ‘ज्ञान गंगा’ जैसी कई किताबें ज़ब्त की थीं। इनमें से कुछ किताबों के लेखक संत रामपाल हैं। पुलिस ने गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद अदालत में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया था, जिसके खिलाफ विक्रेताओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों अर्जुन शेयरोन और हीना चौहान ने तर्क दिया कि धारा 295ए के तहत मुकदमा चलाने के लिए सरकार से कानूनी मंजूरी नहीं ली गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता ने किताबों से कुछ वाक्यों को संदर्भ से बाहर निकालकर पेश किया है, जबकि ये किताबें व्यापक रूप से उपलब्ध हैं और इनकी बिक्री कोई अपराध नहीं है।
वहीं, राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए अपर महाधिवक्ता (अतिरिक्त अधिवक्ता जनरल) लोकेंद्र कुटलेरिया ने कहा कि एफआईआर और चार्जशीट से साफ है कि ये किताबें हिंदू समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से बेची जा रही थीं। हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि अभी तक औपचारिक मंजूरी नहीं मिली है और इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट को पत्र भेजा जा चुका है।

