दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने निर्णय का लिंक गूगल से हटाने के दिये आदेश, जाने क्यों

राजधानी—- दिल्ली हाई कोर्ट ने अकेले रहने का अधिकार और भुलने का अधिकार के मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए अपने ही निर्णय का लिंक सर्च इंजन गूगल से हटाए जाने का आदेश जारी किया है। यह निर्णय भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक से संबंधित ड्रग्स के मामले से बरी होने से जुड़ा हुआ था।

जस्टिस प्रतिभा एम सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि निजता के अधिकार में भूलने का अधिकार और अकेले रहने का अधिकार शामिल है। इस दौरान अदालत ने ऑफिशियल वेबसाइट इंडियन कानून को नारकोटिक्स ड्रग्स और साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट के अंतर्गत दिए गए हाई कोर्ट के फैसले लिंक को हटाने के लिए कहा था। साथ ही सुनिश्चित किया कि लिंक को गूगल और याहू सर्च इंजन द्वारा इसे एक्सेस न किया जा सके। 

कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश में कहा पूर्वाग्रह के कारण याचिकाकर्ता के सामाजिक जीवन और कैरियर की सम्भावनाओ पर असर पड़ सकता है। याचिकाकर्ता को फैसले के जरिये से उक्त मामले में अंततः बरी कर दिया गया है। प्रथम दृष्टया कोर्ट का मानना है कि याची कुछ अंतरिम संरक्षण का हकदार है। 

कोर्ट में दायर अपनी याचिका में अमुक व्यक्ति ने कोर्ट से कहा कि वह भारतीय मूल का है। लेकिन जन्म से अमेरिकी नागरिक है। वह वर्ष 2009 में जब भारत आया था। एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। लोअर कोर्ट ने जहां 2011 में उन्हें बरी कर दिया था।

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वहीं हाई कोर्ट ने दो साल बाद फैसला बरकरार रखा था। साथ ही याची ने बताया कि अमेरिका लौटने पर उन्होंने एक यूनिवर्सिटी में कानून की पढ़ाई करने का फैसला किया। लेकिन नौकरी के लिए उन्हें कई मौकों पर नुकसान का सामना करना पड़ा। क्योंकि दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा दिया गया फैसला गूगल सर्च पर मौजूद है। उन्हें नौकरी देने से पूर्व वेरिफिकेशन के दौरान यह सर्च में यह फैसला उनके संभावित नियोक्ता को भी दिखता है। 

दायर याचिका में कहा गया है कि एकेडमिक रिकॉर्ड अच्छा होने पर भी दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले का गूगल सर्च पर मौजूद होने की वजह से उन्हें नौकरी नही मिल पा रही है। इस दौरान उन्होंने गूगल,इंडियन कानून और वीएलएक्स को नोटिस जारी की थी।वीएलएक्स ने नोटिस मिलने के बाद लिंक को हटा दिया था। लेकिन अन्य वेबसाइटस द्वारा ऐसा न करने के कारण उन्होंने निजता के अधिकार के तहत दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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