शव बरामद न होना हत्या की सजा के लिए बाधक नहीं, यदि परिस्थितिजन्य साक्ष्य पुख्ता हों: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में पति-पत्नी, अबरार और शन्नो की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल शव (corpus delicti) का बरामद न होना अभियोजन पक्ष के मामले को संदिग्ध नहीं बनाता, बशर्ते परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला अटूट हो। कोर्ट ने पाया कि ‘लास्ट सीन’ (अंतिम बार साथ देखा जाना) और अभियुक्तों की निशानदेही पर हुई बरामदगी इस मामले में दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त आधार हैं।

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने वर्ष 2002 के ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने दोनों दोषियों को दो सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जुलाई 2000 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक सिताबी का अबरार की पत्नी शन्नो (अपैलेंट नंबर 2) के साथ अवैध संबंध था। इस संबंध को खत्म करने के लिए सिताबी के भाई वाहिद खान (PW-1) ने 14 जुलाई 2000 को उसकी शादी अपनी साली से करा दी। हालांकि, 20 जुलाई 2000 को सिताबी दिल्ली आया और उसके बाद वह रहस्यमय तरीके से लापता हो गया।

अभियोजन का आरोप था कि अबरार और शन्नो, सिताबी को शादी में शामिल होने के बहाने उत्तर प्रदेश के रामपुर ले गए। वहां उन्होंने उसे अत्यधिक शराब पिलाई और फिर रामगंगा नदी के पुल पर कपड़े की कतरन से उसका गला घोंट दिया। हत्या के बाद उन्होंने सिताबी की दो सोने की अंगूठियां, कलाई घड़ी और नकदी लूट ली और शव को नदी में फेंक दिया। 26 अगस्त 2000 को गिरफ्तारी के बाद अभियुक्तों ने अपना अपराध स्वीकार किया और उनकी निशानदेही पर मृतक का सामान बरामद किया गया।

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पक्षों की दलीलें

दोषियों के वकील ने तर्क दिया कि पूरा मामला केवल ‘लास्ट सीन’ थ्योरी पर आधारित है और गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने में एक महीने की देरी हुई है। उन्होंने कहा कि चूंकि शव बरामद नहीं हुआ है, इसलिए हत्या का मामला नहीं बनता और पुलिस द्वारा बरामदगी के साक्ष्य मनगढ़ंत हैं। बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के रामवृक्ष उर्फ जालिम बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और मुुरुगन बनाम राज्य जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल ‘लास्ट सीन’ के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।

वहीं, सरकारी वकील (APP) ने दलील दी कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला पूरी तरह से जुड़ी हुई है। उन्होंने बताया कि सिताबी के साथ-साथ अभियुक्त भी गायब हो गए थे। इसके अलावा, मृतक की अंगूठियां और घड़ी शन्नो की बहन के घर और एक सुनार (जिसने अंगूठी खरीदी थी) से बरामद होना अभियुक्तों के खिलाफ ठोस सबूत है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने इस मामले में दो मुख्य कानूनी पहलुओं पर गौर किया: ‘लास्ट सीन’ थ्योरी की प्रामाणिकता और शव बरामद न होने का प्रभाव।

‘लास्ट सीन’ साक्ष्य पर: कोर्ट ने उल्लेख किया कि मकान मालकिन (PW-4) और मृतक के साढ़ू (PW-2) ने 25 जुलाई 2000 की रात सिताबी को अभियुक्तों के साथ जाते देखा था। कोर्ट ने कहा:

“वर्तमान मामले में, यह पाए जाने के बाद कि मृतक को अंतिम बार अभियुक्तों की कंपनी में देखा गया था… ये परिस्थितियां ‘लास्ट सीन’ साक्ष्य के साथ मिलकर अभियुक्तों के अपराध को स्थापित करती हैं।”

शव बरामद न होने पर (Corpus Delicti): शव न मिलने के बचाव पक्ष के तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के संजय रजक बनाम बिहार राज्य मामले का उल्लेख किया:

“यह आपराधिक न्यायशास्त्र का कोई अपरिवर्तनीय नियम नहीं है कि शव बरामद करने में पुलिस की विफलता अभियोजन के मामले को संदिग्ध बना देगी। यह केवल अन्य तथ्यों के साथ विचार किए जाने वाले प्रासंगिक कारकों में से एक है।”

बेंच ने रामानंद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य के फैसले को भी उद्धृत किया, जिसमें कहा गया था कि यदि शव का मिलना अनिवार्य कर दिया जाए, तो चतुर अपराधी शव को नष्ट करके कानून से बच निकलेंगे। हाईकोर्ट ने माना कि मृतक की अंगूठियों और घड़ी की बरामदगी जैसे “गंभीर और दोषपूर्ण परिस्थितियां” स्पष्ट रूप से हत्या की ओर इशारा करती हैं।

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निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि घटनाक्रम की श्रृंखला पूरी तरह स्पष्ट है और यह केवल अभियुक्तों के दोषी होने की परिकल्पना की पुष्टि करती है। कोर्ट ने आईपीसी की धारा 302 (हत्या), 365 (अपहरण), 201 (साक्ष्य मिटाना) और 404 (मृतक की संपत्ति का गबन) के तहत उनकी सजा को सही ठहराया।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया:

“अभियुक्तों को अपनी शेष सजा काटने के लिए आज से दो सप्ताह की अवधि के भीतर आत्मसमर्पण करना होगा। आत्मसमर्पण करने में विफल रहने की स्थिति में, राज्य द्वारा उनकी गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम उठाए जाएंगे।”

केस विवरण:

  • केस टाइटल: अबरार आदि बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (N.C.T. of Delhi)
  • केस नंबर: CRL.A. 567/2002
  • बेंच: जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा
  • फैसले की तारीख: 18 मार्च, 2026

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