‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ यानी भूल जाने के अधिकार के तहत अदालती फैसलों में पक्षकारों के नाम से सर्च सुविधा हटाने के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट 2 सितंबर को अंतिम सुनवाई करेगा। यह अपील कानूनी डेटाबेस प्लेटफॉर्म इंडिया कानून की ओर से दायर की गई है। बुधवार को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने मौखिक रूप से कहा कि जनहित न्यायिक रिकॉर्ड तक खुली और आसान पहुंच के पक्ष में है।
जनहित और न्यायिक रिकॉर्ड तक पहुंच पर अदालत के सवाल
जस्टिस सी हरि शंकर और जस्टिस विनोद कुमार की पीठ ने सुनवाई के दौरान पूछा कि किसी भी नागरिक को पक्षकार के नाम के आधार पर अदालती फैसले खोजने से क्यों रोका जाना चाहिए? पीठ ने कहा कि उदाहरण के लिए हर्षद मेहता मामले में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले मौजूद हैं, तो ऐसे में कोई हर्षद मेहता के नाम से सर्च क्यों नहीं कर सकता? अदालत ने टिप्पणी की कि बिना केस नंबर या याचिका संख्या के किसी आम व्यक्ति के लिए विशिष्ट फैसला ढूंढ पाना लगभग असंभव है।
नि:शुल्क प्लेटफॉर्म बनाम सशुल्क डेटाबेस का तर्क
आईकानून सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड (इंडिया कानून) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने तर्क दिया कि यह प्लेटफॉर्म कोई समाचार रिपोर्ट नहीं है, बल्कि एक नि:शुल्क कानूनी डेटाबेस है। यह अदालत और ट्रिब्यूनल के आधिकारिक और अपरिवर्तित फैसलों को होस्ट करता है। दातार ने अदालत को बताया कि संबंधित अदालती फैसले ‘एससीसी ऑनलाइन’ या ‘मनुपत्रा’ जैसे सशुल्क (पेड) प्लेटफॉर्म पर नाम से आसानी से खोजे जा सकते हैं, लेकिन सिंगल जज के निर्देश के कारण इंडिया कानून जैसे नि:शुल्क प्लेटफॉर्म पर आम जनता की पहुंच बाधित हो गई है।
संवैधानिक अधिकार और निजता के फैसले की व्याख्या
अपील में इंडिया कानून ने कहा कि 29 मई का सिंगल जज का आदेश अस्पष्ट दिशा-निर्देश तय करता है, जिससे सेंसरशिप को बढ़ावा मिलता है और सूचना के अधिकार को नुकसान पहुंचता है। कंपनी ने दलील दी कि यह निर्देश संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाले व्यापार और कारोबार के मौलिक अधिकार का हनन करता है। इसके अलावा, याचिका में कहा गया कि सिंगल जज ने निजता के अधिकार से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक के. एस. पुट्टस्वामी फैसले को समझने में चूक की है। पुट्टस्वामी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ की अवधारणा पर चर्चा जरूर की थी, लेकिन सार्वजनिक अदालती रिकॉर्ड से नाम हटाने का कोई असीमित अधिकार प्रदान नहीं किया था।
आरोपमुक्त लोगों पर स्थायी कलंक की आशंका
दूसरी तरफ, एक आपराधिक मामले में डिस्चार्ज हो चुके याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल ने अपील का विरोध किया। उन्होंने कहा कि फैसले अभी भी केस नंबर और अन्य विवरणों के जरिए उपलब्ध हैं, केवल नाम से खोजना रोका गया है। सिब्बल ने तर्क दिया कि यदि नाम से सर्च हटाने का निर्देश वापस लिया गया, तो अदालत से बरी या डिस्चार्ज हो चुके लोगों पर समाज में जीवन भर का कलंक लगा रहेगा।
सिंगल जज के फैसले की पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद 29 मई के सिंगल जज के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें 35 से अधिक याचिकाओं पर निर्णय सुनाते हुए गूगल और इंडिया कानून जैसे प्लेटफॉर्म को कुछ मामलों में नाम-आधारित सर्च को हटाने (डी-इंडेक्स करने) के निर्देश दिए गए थे। यह आदेश ऐसे मुकदमों पर लागू किया गया था जो निजी प्रकृति के थे या जिनमें आरोपी बरी, डिस्चार्ज, एफआईआर रद्द (क्वाश) या आपसी समझौते के आधार पर मुक्त हो चुके थे। हालांकि, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ गंभीर अपराधों, जन विश्वासघात, लोक सेवकों और जनप्रतिनिधियों से जुड़े मुकदमों में यह छूट नहीं दी गई थी।
2 सितंबर को होगी अंतिम बहस
बुधवार की सुनवाई में दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ ने सभी पक्षों की ओर से नोटिस स्वीकार माना। दोनों पक्षों द्वारा अंतरिम राहत की अर्जियों पर समय बिताने के बजाय सीधे अंतिम बहस कराने पर सहमति जताने के बाद अदालत ने मामले की सुनवाई 2 सितंबर को दोपहर 2:30 बजे तय की है।

