दिल्ली हाईकोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कार्य में लगे सरकारी शिक्षकों के अत्यधिक कार्यभार और मानसिक तनाव पर गहरी चिंता जताई है। अदालत ने भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) को निर्देश दिया है कि वह शिक्षकों की स्थिति के प्रति संवेदनशील रहे और यह सुनिश्चित करे कि चुनावी कर्तव्यों के कारण बच्चों के शिक्षा के अधिकार और नियमित पढ़ाई पर कोई असर न पड़े।
आयोग के नोटिस के रुख पर जताई नाराजगी
मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस काारिया की पीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए स्कूलों के प्रधानाचार्यों को जारी ईसीआई के उस आदेश के रुख पर कड़ा एतराज जताया, जिसमें चुनावी काम में बाधा न डालने की चेतावनी दी गई थी। पीठ ने टिप्पणी की कि आयोग की भाषा डराने वाली है। अदालत ने कहा कि आयोग को जमीनी हकीकत को समझना होगा। अधिकतर शिक्षिकाएं पारिवारिक जिम्मेदारियां भी संभालती हैं और स्कूल के घंटों के बाद चुनावी काम करने से उन्हें रोजाना 11 घंटे तक काम करना पड़ रहा है। पीठ ने चुनाव आयोग से शिक्षकों की कार्य परिस्थितियों को अधिक मानवीय बनाने को कहा।
शिक्षा के अधिकार के साथ संतुलन जरूरी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची अपडेट करने का काम निसंदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे बच्चों के शिक्षा के अधिकार अधिनियम (आरटीई) की कीमत पर पूरा नहीं किया जा सकता। पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि वे जवाब-दावा (रीजॉइंडर) दाखिल कर ऐसे विशिष्ट उदाहरण अदालत के समक्ष रखें, जहां शिक्षकों को पढ़ाई छोड़कर चुनाव काम को प्राथमिकता देने के लिए मजबूर किया गया हो। मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को तय की गई है।
चुनाव आयोग ने दी अपनी सफाई
दूसरी ओर, चुनाव आयोग के वकील ने अदालत को आश्वस्त किया कि शिक्षकों पर कोई अत्यधिक बोझ नहीं डाला जा रहा है। आयोग ने बताया कि मतदाता सूची पुनरीक्षण का यह अभियान 8 अगस्त तक ही प्रस्तावित है और शिक्षकों को सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप केवल गैर-शिक्षण घंटों, छुट्टियों या गैर-शिक्षण दिवसों में ही काम पर लगाया गया है, जिससे नियमित अध्यापन प्रभावित नहीं हुआ है।
आयोग ने यह भी कहा कि इस काम में कुल शिक्षण कर्मचारियों का केवल 14 प्रतिशत ही इस्तेमाल किया जा रहा है और किसी भी शिक्षक की ओर से अब तक कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। इसके अलावा, बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) और प्रगणना कर्मचारियों की सहायता के लिए स्वयंसेवकों और जलपान की व्यवस्था भी की गई है।
शिक्षकों की तैनाती की सीमा तय करने की मांग
यह जनहित याचिका अधिवक्ता राजेश कुमार गोगना और अशोक अग्रवाल द्वारा दिल्ली के सरकारी, नगर निगम और सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों बच्चों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए दायर की गई है। याचिका में अंबेडकर नगर विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा गया कि 15 सरकारी स्कूलों से 149 शिक्षकों को ड्यूटी पर लगाया गया, जिससे कुछ स्कूलों में पूरी नियमित फैकल्टी ही कक्षाओं से नदारद हो गई और पढ़ाई का जिम्मा अतिथि शिक्षकों या अन्य विषयों के शिक्षकों पर आ गया।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह व्यवस्था ईसीआई बनाम सेंट मैरी स्कूल मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और आरटीई अधिनियम 2009 की धारा 27 का उल्लंघन करती है। साथ ही, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 159 के तहत उपलब्ध गैर-शिक्षण कर्मचारियों की अनदेखी की जा रही है। याचिका में मांग की गई है कि शिक्षकों की चुनावी तैनाती को अधिकतम 10 प्रतिशत तक सीमित किया जाए और सबसे पहले गैर-शिक्षण कर्मचारियों की सेवाएं ली जाएं।

