दिल्ली हाईकोर्ट ने पेटेंट उल्लंघन के एक मुकदमे को वापस लेने की अनुमति मांग रहे वादी की अर्जी को खारिज कर दिया है, जिसमें भविष्य में नया मुकदमा दायर करने की छूट (Liberty to institute a fresh suit) मांगी गई थी। जस्टिस तुषार राव गेडाला की पीठ ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश XXIII नियम 1(3)(b) के तहत सशर्त वापसी के लिए ‘पर्याप्त आधार’ नहीं हैं। कोर्ट ने वादी पर “अनावश्यक मुकदमेबाजी” के लिए 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
मामले की पृष्ठभूमि
वादी, पवन कुमार गोयल ने प्रतिवादियों (डॉ. धन सिंह और अन्य) के खिलाफ एक मुकदमा (CS(COMM) 672/2022) दायर किया था। इसमें वादी ने अपने भारतीय पेटेंट संख्या 369150 के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) की मांग की थी। यह पेटेंट ‘राउवोल्फिया कैनसेंस/टेट्राफिला’ (Rauwolfia canescenes/tetraphylla) से 90% से अधिक शुद्धता वाले ‘अल्फा योहिम्बाइन’ (Alpha Yohimbine) को निकालने की प्रक्रिया से संबंधित था।
सुनवाई के दौरान, वादी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री नलिन कोहली ने 21 जुलाई, 2025 के एक हलफनाफे के आधार पर मुकदमा वापस लेने की इच्छा व्यक्त की। वादी का तर्क था कि प्रतिवादियों द्वारा दायर दस्तावेजों से पता चलता है कि वे ‘राउवोल्फिया वोमिटोरिया’ (Rauwolfia Vomitoria) का उपयोग कर रहे हैं, जो वादी के पेटेंट का उल्लंघन नहीं करता है।
हालांकि, वादी ने यह वापसी CPC के आदेश XXIII नियम 1(3)(b) के तहत मांगी थी, ताकि अगर भविष्य में प्रतिवादी ‘राउवोल्फिया कैनसेंस/टेट्राफिला’ का उपयोग करते हैं, तो वादी को उसी ‘कॉज़ ऑफ एक्शन’ (वाद के कारण) पर नया मुकदमा दायर करने की छूट मिल सके।
पक्षकारों की दलीलें
वादी ने तर्क दिया कि यदि प्रतिवादी भविष्य में ‘राउवोल्फिया कैनसेंस/टेट्राफिला’ का उपयोग करते हैं, तो यह पेटेंट का उल्लंघन होगा। यदि उन्हें नया मुकदमा दायर करने की छूट नहीं दी गई, तो वे भविष्य के उल्लंघन के खिलाफ उपचारहीन हो जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि ‘डोमिनस लिटस’ (वाद का स्वामी) होने के नाते, वादी को अपने कारणों से मुकदमा वापस लेने का अधिकार है।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों के वकील श्री वैभव वुट्स ने सशर्त वापसी का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि यदि वादी बिना किसी शर्त के मुकदमा वापस लेते हैं (Withdrawal Simpliciter), तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन नया मुकदमा दायर करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए।
प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि वादी का यह आधार गलत है कि वे केवल ‘राउवोल्फिया वोमिटोरिया’ का उपयोग करते हैं। उन्होंने अपने ‘बैच मैन्युफैक्चरिंग रिकॉर्ड्स’ (BMR) का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट रूप से निर्यात के लिए सामान बनाने की प्रक्रिया में ‘राउवोल्फिया टेट्राफिला’ का उपयोग दिखाया गया था। इसके अलावा, प्रतिवादियों ने बताया कि वादी द्वारा नियुक्त आईआईटी (IIT) के एक विशेषज्ञ ने 12 अप्रैल, 2023 को अपनी रिपोर्ट में कहा था कि प्रतिवादी की प्रक्रिया वादी की पेटेंट प्रक्रिया के “समान या समरूप नहीं” है। इसके बावजूद वादी ने मुकदमा जारी रखा।
कोर्ट की टिप्पणियां और विश्लेषण
जस्टिस तुषार राव गेडाला ने पाया कि वादी की प्रार्थना CPC के आदेश XXIII नियम 1(3)(b) के मानदंडों को पूरा नहीं करती है, जो केवल “औपचारिक दोष” (Formal Defect) या “पर्याप्त आधार” होने पर लागू होता है।
कोर्ट ने वादी के तर्कों को विरोधाभासी पाया। पीठ ने कहा कि यदि प्रतिवादी वास्तव में ‘राउवोल्फिया टेट्राफिला’ का उपयोग कर रहे हैं (जैसा कि उनके दस्तावेजों में है), तो उल्लंघन का कारण वर्तमान में भी मौजूद है, इसलिए भविष्य के लिए छूट की आवश्यकता ही नहीं है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“यह न्यायालय यह समझने में असमर्थ है कि ‘राउवोल्फिया वोमिटोरिया’ का उपयोग वाद का कारण कैसे समाप्त कर देगा, जबकि ‘राउवोल्फिया कैनसेंस/टेट्राफिला’ का उपयोग… पेटेंट के उल्लंघन के बराबर होगा… इस प्रकार, वादी को ‘एप्रोबेट और रिप्रोबेट’ (Approbate and Reprobate – एक ही समय में स्वीकार और अस्वीकार) करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
हाईकोर्ट ने वादी के अपने विशेषज्ञ की राय पर भी महत्वपूर्ण भरोसा जताया। निर्णय में कहा गया:
“वादी ने रिपोर्ट से इनकार नहीं किया है, जो स्पष्ट रूप से इंगित करती है कि प्रतिवादी वास्तव में अपनी प्रक्रिया में ‘राउवोल्फिया टेट्राफिला’ का उपयोग कर रहे हैं और साथ ही यह भी घोषित करती है कि वादी की पेटेंट प्रक्रिया और प्रतिवादी की प्रक्रिया पूरी तरह से भिन्न हैं।”
वादी द्वारा हलफनामे के माध्यम से वापसी के प्रयास पर कोर्ट ने टिप्पणी की:
“इस प्रकार, जो सीधे तौर पर हासिल नहीं किया जा सकता, उसे अप्रत्यक्ष रूप से हासिल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
निर्णय
दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि वादी नया मुकदमा दायर करने की छूट के साथ वापसी के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत करने में विफल रहे। नतीजतन, CPC के आदेश XXIII नियम 1(3)(b) के तहत दायर प्रार्थना को खारिज कर दिया गया।
यह देखते हुए कि वादी के अपने विशेषज्ञ द्वारा प्रक्रियाओं को भिन्न बताए जाने के बावजूद प्रतिवादी को मुकदमेबाजी में घसीटा गया, कोर्ट ने वादी पर जुर्माना लगाया।
कोर्ट ने आदेश दिया, “तदनुसार, वादी पर लगाए गए 50,000 रुपये का जुर्माना चार (4) सप्ताह के भीतर प्रतिवादी को भुगतान किया जाएगा।”
मामले की अगली सुनवाई 8 जुलाई, 2026 के लिए सूचीबद्ध की गई है।
- केस टाइटल: पवन कुमार गोयल बनाम डॉ. धन सिंह और अन्य
- केस नंबर: CS(COMM) 672/2022

