दिल्ली हाईकोर्ट ने मेट्रिमोनियल साइबर फ्रॉड रैकेट में आरोपी नाइजीरियाई नागरिक को जमानत देने से इनकार किया

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक नाइजीरियाई नागरिक को जमानत देने से इनकार कर दिया है, जो कथित रूप से एक अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी गिरोह का हिस्सा था। यह गिरोह फर्जी प्रोफाइल बनाकर मेट्रिमोनियल वेबसाइटों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से लोगों को ठगने के लिए सक्रिय था।

न्यायमूर्ति शालिंदर कौर ने आरोपी पॉल ओन्येजी अतुह की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि जांच से इस अपराध की “अंतरराष्ट्रीय और संगठित प्रकृति” और “तकनीकी रूप से जटिल कार्यप्रणाली” का पता चलता है, जिससे यह मामला जमानत देने योग्य नहीं बनता।

अतुह 2020 में स्टूडेंट वीजा पर भारत आया था और मई 2022 में ग्रेटर नोएडा से गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी एक महिला की शिकायत के बाद हुई, जिसमें उसने आरोप लगाया था कि उसे संगम डॉट कॉम मेट्रिमोनियल वेबसाइट पर “डॉ. अंकित वर्मा” नामक व्यक्ति ने संपर्क किया, जो खुद को कनाडा स्थित डॉक्टर बताता था। आरोपी ने दावा किया कि वह दिल्ली एयरपोर्ट पर विदेशी मुद्रा ज्यादा होने के कारण कस्टम्स द्वारा रोका गया है।

इसके बाद एक फर्जी कस्टम अधिकारी बनकर किसी ने महिला से ₹55,900 कस्टम पेनल्टी के रूप में ट्रांसफर करवाए। जब ₹1.5 लाख की और मांग “वित्त मंत्रालय की क्लीयरेंस” के नाम पर की गई, तो महिला को संदेह हुआ और उसने पुलिस से संपर्क किया।

साइबर सेल की जांच में सामने आया कि अतुह और उसके दो साथी एक संगठित ठगी रैकेट चला रहे थे, जिसमें 26 बैंक खाते, 15 मोबाइल फोन, 20 सिम कार्ड, दो लैपटॉप और चार डोंगल डिवाइसों का इस्तेमाल किया जा रहा था। पुलिस ने ₹1.95 लाख नकद जब्त किए और लगभग ₹4 लाख विभिन्न खातों में फ्रीज किए।

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पुलिस ने कम से कम 17 पीड़ितों की पहचान की है, जिनसे कुल मिलाकर ₹33.73 लाख की ठगी हुई।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अतुह के मोबाइल फोन से प्राप्त व्हाट्सएप चैट्स से यह साफ हुआ कि वह उस बैंक खाते से जुड़ा हुआ था जिसमें ठगे गए पैसे जमा किए गए। बचाव पक्ष द्वारा लगाए गए आरोप कि अतुह को फंसाया जा रहा है, को न्यायालय ने खारिज कर दिया और कहा कि इस स्तर के अपराध और कई प्राथमिकी व पीड़ितों की मौजूदगी को देखते हुए आरोपी की हिरासत आवश्यक है।

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न्यायालय ने 11 जुलाई के आदेश में कहा, “ऑपरेशन की प्रकृति और दायरा यह दर्शाता है कि यह कोई एकाकी या आवेगजनित धोखाधड़ी नहीं थी, बल्कि फर्जी प्रोफाइल और ‘डिंग टोन ऐप’ जैसे डिजिटल मॉर्फिंग टूल्स का उपयोग करते हुए एक सुव्यवस्थित योजना के तहत की गई ठगी थी।”

हालांकि आरोपी पिछले तीन वर्षों से हिरासत में है, कोर्ट ने कहा कि अपराध की गंभीरता, ठगी की व्यापकता और रैकेट के संगठित ढांचे को देखते हुए उसे जमानत नहीं दी जा सकती।

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