छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत चेक बाउंस के मामलों में पावर ऑफ अटॉर्नी (PoA) होल्डर की भूमिका पर महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की है। हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय (Sessions Court) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को केवल इसलिए बरी कर दिया गया था क्योंकि शिकायत पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर के माध्यम से दायर की गई थी।
न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि शिकायत और शपथ पत्र में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर को लेनदेन के तथ्यों की जानकारी है, तो उसके द्वारा दायर की गई शिकायत पूरी तरह से वैध और स्वीकार्य है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील मेसर्स महालक्ष्मी ट्रैक्टर्स की प्रोप्राइटर श्रीमती मोनालीसा अग्रवाल की ओर से उनके पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर, बृजमोहन अग्रवाल द्वारा दायर की गई थी। मामला एक ट्रैक्टर और उसके उपकरणों की उधारी पर बिक्री से जुड़ा था। प्रतिवादी (आरोपी) देवानंद पटेल ने भुगतान के लिए 7,75,000 रुपये का चेक जारी किया था, जो बैंक द्वारा अपर्याप्त निधि (Insufficient Funds) के कारण अनादरित (Dishonour) हो गया।
इसके बाद, आरोपी को कानूनी नोटिस भेजा गया, जिसे उसने स्वीकार करने से इनकार कर दिया। शिकायतकर्ता ने धारा 138 एनआई एक्ट के तहत मामला दायर किया। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), रायगढ़ ने 27 फरवरी, 2018 को आरोपी को दोषी ठहराया।
हालांकि, आरोपी ने इस फैसले को सत्र न्यायालय में चुनौती दी। 5वें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, रायगढ़ ने 30 जुलाई, 2018 को अपील स्वीकार करते हुए आरोपी को बरी कर दिया। सत्र न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं है जो यह साबित करे कि पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर को लेनदेन की जानकारी थी। इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील, श्री आयुष लाल ने तर्क दिया कि पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर ने धारा 145 एनआई एक्ट के तहत दायर अपने शपथ पत्र और शिकायत में स्पष्ट रूप से कहा था कि वह व्यवसाय का संचालन कर रहे हैं और उन्हें लेनदेन के सभी तथ्यों की जानकारी है। उन्होंने कहा कि सत्र न्यायालय ने इन महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी कर “भौतिक अनियमितता” (Material Irregularity) की है।
दूसरी ओर, प्रतिवादी के वकील श्री अरविंद श्रीवास्तव ने बरी किए जाने के आदेश का समर्थन किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ए.सी. नारायणन बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर को तथ्यों का व्यक्तिगत ज्ञान नहीं था, इसलिए उसकी गवाही स्वीकार्य नहीं हो सकती।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने पावर ऑफ अटॉर्नी, शिकायत और शपथ पत्र का गहनता से परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर, शिकायतकर्ता की ओर से व्यवसाय चला रहा था और वह “मामले के तथ्यों से अच्छी तरह परिचित” था।
हाईकोर्ट ने हाल ही में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले नरेश पॉटरीज बनाम आरती इंडस्ट्रीज (2025) का हवाला दिया। इस फैसले में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि जब शिकायतकर्ता कोई कंपनी या फर्म हो, तो उसके अधिकृत व्यक्ति द्वारा शिकायत दायर की जा सकती है, बशर्ते उसे सामग्री का ज्ञान हो।
हाईकोर्ट ने कहा:
“पावर ऑफ अटॉर्नी, शिकायत और धारा 145 एनआई एक्ट के तहत दायर शपथ पत्र के अवलोकन से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर शिकायत दर्ज करने के लिए सक्षम है। उसे एग्रीमेंट के निष्पादन और चेक जारी करने से संबंधित लेनदेन की पूरी जानकारी है।”
अदालत ने यह भी माना कि कानूनी नोटिस पर “लेने से इनकार” (Refused to accept) की पृष्ठांकन (Endorsement) थी, जिसे जनरल क्लॉज़ एक्ट की धारा 27 के तहत तामील माना जाएगा, जब तक कि इसका खंडन न किया जाए।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय द्वारा पारित 30 जुलाई, 2018 के बरी करने के आदेश को रद्द कर दिया और जेएमएफसी द्वारा पारित दोषसिद्धि के आदेश को बहाल कर दिया।
हालांकि, कोर्ट ने सजा में संशोधन किया। कोर्ट ने आरोपी को चेक राशि और मुआवजे सहित कुल 8,75,000 रुपये का भुगतान दो महीने के भीतर करने का निर्देश दिया। यदि आरोपी निर्धारित समय में भुगतान करने में विफल रहता है, तो उसे एक महीने के साधारण कारावास की सजा भुगतनी होगी।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: श्रीमती मोनालीसा अग्रवाल बनाम देवानंद पटेल व अन्य
- केस नंबर: ACQA No. 84 of 2019 (2026:CGHC:5631)
- कोरम: न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास

