गलती से मिले अतिरिक्त वेतन की सेवानिवृत्त कर्मचारी से भी हो सकती है वसूली, आर्थिक कठिनाई साबित करना जरूरी: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि वेतन निर्धारण में गलती के कारण सरकारी कर्मचारी को किए गए अतिरिक्त भुगतान की वसूली सेवानिवृत्ति के बाद भी की जा सकती है। हालांकि, असाधारण आर्थिक कठिनाई की स्थिति में राहत मिल सकती है, लेकिन इसके लिए कर्मचारी को अपनी कठिनाई का दावा करने के साथ उसे साक्ष्यों से साबित भी करना होगा।

जस्टिस बिभु दत्त गुरु ने उच्च शिक्षा विभाग के सेवानिवृत्त लेखाकार उमेश पाठक की याचिका खारिज करते हुए उनके सेवानिवृत्ति लाभों से 1,56,865 रुपये की वसूली का आदेश बरकरार रखा।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सुनवाई का अवसर नहीं देने के कारण पहले वसूली आदेश को रद्द किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि विभाग दोबारा वसूली का आदेश नहीं दे सकता।

आर्थिक कठिनाई का दावा साक्ष्यों से साबित करना जरूरी

हाईकोर्ट ने Chandi Prasad Uniyal vs State of Uttarakhand में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि कानूनी अधिकार के बिना किए गए अतिरिक्त भुगतान की वसूली की जा सकती है। हालांकि, अत्यधिक आर्थिक कठिनाई जैसी कुछ अपवादपूर्ण परिस्थितियों में राहत संभव है।

कोर्ट ने Dr. M.K. Ravi Varma vs National Institute of Technology के हालिया फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने State of Punjab vs Rafiq Masih (White Washer) सहित अतिरिक्त भुगतान की वसूली से जुड़े अन्य फैसलों पर विचार किया था।

बेंच ने पाया कि याचिकाकर्ता ने असाधारण आर्थिक कठिनाई दिखाने के लिए बैंक खाते या संपत्ति से संबंधित कोई विवरण अथवा अन्य सामग्री पेश नहीं की थी।

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हाईकोर्ट ने कहा:

“आर्थिक कठिनाई का प्रश्न प्रत्येक मामले के विशेष तथ्यों के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए और इसका दावा करने के साथ इसे अदालत की संतुष्टि के अनुसार साबित करना भी आवश्यक है।”

कोर्ट ने आगे कहा:

“ऐसा कोई दावा या सहायक सामग्री उपलब्ध नहीं होने पर असाधारण आर्थिक कठिनाई के आधार पर हस्तक्षेप करने का मामला नहीं बनता।”

पहले वसूली आदेश के रद्द होने से दोबारा कार्यवाही पर रोक नहीं

याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि हाईकोर्ट द्वारा पहले वसूली आदेश को रद्द किए जाने के बाद विभाग उसी राशि की वसूली के लिए नया आदेश जारी नहीं कर सकता था।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा:

“पहले आदेश में इस प्रश्न का अंतिम निर्णय नहीं किया गया था कि कथित अतिरिक्त भुगतान की किसी भी परिस्थिति में वसूली नहीं की जा सकती।”

बेंच ने स्पष्ट किया:

“पहले आदेश को रद्द किए जाने का अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि इस अदालत के निर्देशों का पालन करने के बाद नया आदेश पारित करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था।”

कोर्ट के अनुसार, पहले आदेश से याचिकाकर्ता को अपनी वैध पात्रता से अधिक प्राप्त रकम अपने पास रखने का कोई बिना शर्त अधिकार नहीं मिला था।

सेवानिवृत्ति के बाद 1.56 लाख रुपये की वसूली का विवाद

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उमेश पाठक वर्ष 1987 में उच्च शिक्षा विभाग में सहायक ग्रेड-III के पद पर नियुक्त हुए थे।

वर्ष 2008 में उन्हें लेखाकार ग्रेड-II और 2018 में लेखाकार ग्रेड-I के पद पर पदोन्नति मिली। वह 31 अगस्त 2019 को सेवानिवृत्त हुए।

सेवानिवृत्ति के बाद उनके वेतन निर्धारण और वेतनवृद्धि पर आपत्तियां उठीं। इसके आधार पर 13 जुलाई 2020 को उनके सेवानिवृत्ति लाभों से 1,56,865 रुपये वसूलने का आदेश जारी किया गया।

इस आदेश को चुनौती देने पर हाईकोर्ट ने 16 मार्च 2026 को इसे इसलिए रद्द कर दिया था क्योंकि कर्मचारी को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था।

हाईकोर्ट ने उच्च शिक्षा संचालनालय के संयुक्त निदेशक को नोटिस और सुनवाई के बाद तीन महीने के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित करने तथा इसके बाद नियमित मासिक पेंशन देने के प्रश्न पर विचार करने का निर्देश दिया था।

जून 2026 में विभाग ने मामले पर दोबारा विचार करके वसूली को उचित ठहराया। इसी आदेश के खिलाफ वर्तमान याचिका दाखिल की गई थी।

दोनों पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ऐश्वर्य दीवान ने कहा कि पहले वसूली आदेश को रद्द किए जाने के बाद उसी रकम की वसूली का नया आदेश जारी करना उचित नहीं था।

उन्होंने Rafiq Masih मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि सेवानिवृत्त कर्मचारी से अतिरिक्त भुगतान की वसूली नहीं की जा सकती।

राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता अनादि शर्मा ने कहा कि पहले आदेश में नए सिरे से वसूली पर कोई रोक नहीं लगाई गई थी।

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उन्होंने बताया कि विभाग ने हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार दोबारा विचार करके आदेश पारित किया था। उनके अनुसार, कर्मचारी को कानूनी पात्रता से अधिक भुगतान किया गया था और उस राशि को अपने पास रखने का उसे पूर्ण अधिकार नहीं था।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

सभी तथ्यों और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर विचार करने के बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वसूली आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

आदेश के सार में दर्ज किया गया:

“सरकारी कर्मचारी को गलती से किए गए अतिरिक्त भुगतान की वसूली हमेशा की जा सकती है, अत्यधिक आर्थिक कठिनाई के कुछ अपवादों को छोड़कर। हालांकि, ऐसी राहत अधिकार के रूप में नहीं मांगी जा सकती।”

हाईकोर्ट ने उमेश पाठक की याचिका खारिज कर दी और 1,56,865 रुपये की वसूली का आदेश बरकरार रखा।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: Umesh Pathak vs State of Chhattisgarh and Others

केस नंबर: WPS No. 7746 of 2026

पीठ: जस्टिस बिभु दत्त गुरु

फैसले की तारीख: 29 अक्टूबर 2026

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