छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने चिकित्सा उपकरणों की खरीद में कथित भ्रष्टाचार से जुड़ी एक रिट याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी संभावित आरोपी के पास आपराधिक कार्यवाही शुरू होने से पहले सुनवाई का कोई निहित अधिकार नहीं है, क्योंकि प्रक्रियात्मक कानून (CrPC/BNSS) में FIR दर्ज होने से पहले ऐसी किसी सुनवाई का प्रावधान नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला रायपुर स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल में ‘पीईटी सीटी स्कैन’ और ‘गामा कैमरा’ की खरीद और स्थापना से जुड़ा है। याचिकाकर्ता, डॉ. विवेक चौधरी, जो उस समय अस्पताल के संयुक्त निदेशक-सह-अधीक्षक थे, ने 30 अगस्त 2021 के उस पत्र को चुनौती दी थी जिसमें उनके खिलाफ FIR दर्ज करने की सिफारिश की गई थी।
लगभग ₹18.45 करोड़ के इस सरकारी खर्च में अनियमितताओं की शिकायतों के बाद, राज्य सरकार ने छह सदस्यीय समिति गठित की थी। 20 जुलाई 2021 की जांच रिपोर्ट में याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां की गई थीं, जिसके आधार पर आपराधिक जांच की सिफारिश की गई।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता का पक्ष: वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज परांजपे के माध्यम से याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि FIR की सिफारिश अवैध और निराधार है। उनका कहना था कि उनकी भूमिका केवल तकनीकी विनिर्देश (specifications) और राय देने तक सीमित थी, जो उन्होंने तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री के निर्देश पर दी थी। बजट आवंटन या निविदा (tender) प्रक्रिया में उनकी कोई निर्णयात्मक भूमिका नहीं थी। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि जांच समिति ने उन्हें बिना सुने रिपोर्ट तैयार कर ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ का उल्लंघन किया है।
राज्य सरकार का पक्ष: अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण दास ने दलील दी कि जांच समिति केवल एक ‘तथ्य-खोज निकाय’ (fact-finding body) थी, न कि कोई न्यायिक संस्था, इसलिए औपचारिक सुनवाई अनिवार्य नहीं थी। राज्य ने जोर दिया कि संज्ञेय अपराधों की जांच करना सरकार का स्वतंत्र अधिकार है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम राजेश अग्रवाल मामले का हवाला देते हुए कहा गया कि FIR दर्ज होने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस बिभु दत्त गुरु ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता खरीद प्रक्रिया के महत्वपूर्ण चरणों में सक्रिय रूप से शामिल थे। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए तकनीकी इनपुट और अनुमानित लागत ही वित्तीय और प्रशासनिक निर्णयों का आधार बने।
प्राकृतिक न्याय के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा:
“यह स्थापित सिद्धांत है कि प्रारंभिक या तथ्य-खोज जांच के मामले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का कड़ाई से पालन आवश्यक नहीं है। सुनवाई के विस्तृत अवसर की आवश्यकता उस स्तर पर होती है जहां प्राधिकरण किसी व्यक्ति के नागरिक अधिकारों को प्रभावित करने वाला या दंड देने वाला अंतिम निर्णय लेने का प्रस्ताव करता है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि जांच रिपोर्ट केवल सिफारिशी प्रकृति की है और इससे सीधे तौर पर कोई नागरिक या दंडात्मक परिणाम लागू नहीं होते। FIR से पहले सुनवाई के अधिकार पर कोर्ट ने टिप्पणी की:
“एक संभावित आरोपी के पास आपराधिक कार्यवाही शुरू होने से पहले सुनवाई का कोई निहित अधिकार नहीं है। ऐसी दलील को स्वीकार करने से आपराधिक न्याय प्रणाली की प्रभावकारिता गंभीर रूप से प्रभावित होगी।”
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम डब्ल्यू.एन. चड्ढा मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि जांच से पहले आरोपी को सुनवाई का मौका देना “कार्यवाही को विफल करेगा और कानून द्वारा अपेक्षित त्वरित कार्रवाई में बाधा उत्पन्न करेगा।”
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह मामला किसी ऐसी ‘असाधारण श्रेणी’ में नहीं आता जहां जांच के शुरुआती चरण में ही हस्तक्षेप किया जाए। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की जिम्मेदारी का निर्धारण गहन जांच और ट्रायल का विषय है। इस स्तर पर हस्तक्षेप करना जांच को समय से पहले दबाने जैसा होगा। इसी के साथ रिट याचिका खारिज कर दी गई और पूर्व में दिया गया अंतरिम आदेश वापस ले लिया गया।

