अवमानना की कार्यवाही व्यक्तिगत प्रकृति की होती है, वैधानिक निकायों के खिलाफ नहीं चलाई जा सकती: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अवमानना क्षेत्राधिकार के कानूनी पहलुओं पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि अवमानना की कार्यवाही ‘इन पर्सोनम’ यानी किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ ही चलाई जा सकती है, किसी कॉर्पोरेट या वैधानिक निकाय के खिलाफ नहीं। जस्टिस बिभु दत्त गुरु की एकल पीठ ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को मुख्य प्रतिवादी बनाने वाली एक अवमानना याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी है कि वह संबंधित व्यक्तिगत अधिकारियों के खिलाफ नई अवमानना याचिका दायर कर सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अवमानना याचिका हाईकोर्ट द्वारा 8 अक्टूबर 2024 को रिट याचिका (WPC No. 529 of 2023 – अरविंद कुमार गोयल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य) में पारित एक आदेश की जानबूझकर की गई अनदेखी के आरोप में दायर की गई थी। उस आदेश में हाईकोर्ट ने NHAI को निर्देश दिया था कि वह याचिकाकर्ता अरविंद कुमार गोयल की शिकायतों का निराकरण आदेश मिलने के 90 दिनों के भीतर करे।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि इस आदेश का पालन नहीं किया गया। इसके बाद उसने अवमानना याचिका दायर की, जिसमें “भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, चेयरमैन के माध्यम से” को प्रतिवादी नंबर 1 बनाया गया। इसके साथ ही NHAI और राज्य प्रशासन के सात अन्य अधिकारियों को भी व्यक्तिगत रूप से प्रतिवादी बनाया गया था।

पक्षों की दलीलें

मामले में मुख्य कानूनी बहस इस बात पर केंद्रित थी कि क्या NHAI जैसे वैधानिक निकाय को अवमानना मामले में प्रतिवादी के रूप में शामिल किया जा सकता है या नहीं।

याचिकाकर्ता की ओर से उपस्थित वकील बी.पी. शर्मा और एम.एल. साकेत ने दलील दी कि NHAI इस अवमानना याचिका में एक आवश्यक पक्षकार है। उनका कहना था कि चूंकि मूल आदेश प्राधिकरण को संबोधित था, इसलिए अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12(5) के तहत NHAI के खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिए। वकीलों ने तर्क दिया कि उक्त धारा के स्पष्टीकरण के अनुसार ‘कंपनी’ के अंतर्गत कोई भी कॉर्पोरेट निकाय शामिल है, जिससे प्राधिकरण स्वयं कार्यवाही के लिए एक उचित पक्षकार बन जाता है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत

हाईकोर्ट ने अपने विश्लेषण में अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12(5) के कानूनी ढांचे का बारीकी से अध्ययन किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान मुख्य रूप से तब व्यक्तिगत निदेशकों, प्रबंधकों, सचिवों या अन्य अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के लिए है, जब कॉर्पोरेट संस्था की ओर से जानबूझकर की गई उपेक्षा या मिलीभगत साबित हो जाए।

अदालत ने इस बात पर विशेष बल दिया कि अवमानना क्षेत्राधिकार अर्ध-आपराधिक (quasi-criminal) प्रकृति का होता है। इसे संविधान के अनुच्छेद 300 के तहत राज्य या वैधानिक निकाय के खिलाफ किए जाने वाले सामान्य सिविल मुकदमों की तरह नहीं माना जा सकता। किसी भी सरकारी या कॉर्पोरेट अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराने से पहले यह साबित होना जरूरी है कि वह अधिकारी संबंधित विषय का प्रभारी था और उसने जानबूझकर निर्देश का उल्लंघन किया।

अपने इस निष्कर्ष को सुदृढ़ करने के लिए हाईकोर्ट ने पूर्व के महत्वपूर्ण अदालती फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने सबसे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा ताराफतुल्ला मंडल व अन्य बनाम एस.एन. मैत्रा व अन्य (AIR 1952 Calcutta 919) मामले में दी गई टिप्पणियों को उद्धृत किया:

“अवमानना की कार्यवाही अपनी प्रकृति में ‘इन पर्सोनम’ (व्यक्तिगत) कार्यवाही है। इसलिए, अवमानना की कार्यवाही को किसी भी स्थिति में प्रतिनिधि कार्यवाही का रूप लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। याचिका में प्रतिवादियों में से एक को ‘पश्चिम बंगाल राज्य, जिसका प्रतिनिधित्व भूमि और भूमि राजस्व विभाग के सचिव एस. बनर्जी द्वारा किया गया है’ के रूप में दर्शाया गया है। मेरा मानना है कि यह पूरी तरह से अनुचित प्रक्रिया है और इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती…”

इसके साथ ही कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले के एक अन्य हिस्से का भी उल्लेख किया जिसमें राज्य को संपूर्ण संस्था के रूप में प्रतिवादी बनाने की प्रथा की आलोचना की गई थी:

“चूंकि अवमानना की कार्यवाही में किसी विशेष व्यक्ति द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले राज्य को पक्षकार बनाने की प्रथा आम होती जा रही है, इसलिए यह बताना आवश्यक है कि सही प्रक्रिया क्या है। किसी विशेष राज्य को ही जेल भेजने की मांग करना, या राज्य को शिकायतकर्ता द्वारा नामित किसी व्यक्तिगत अधिकारी में प्रतिरूपित मानकर उस अधिकारी के रूप में राज्य को जेल भेजने की मांग करना, इससे कम सटीक या इससे अधिक हास्यास्पद कुछ नहीं हो सकता। राज्य कोई नाबालिग, मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति या कोई हिंदू देवता नहीं है कि उसका प्रतिनिधित्व उस तरह किया जा सके जैसा इस याचिका में करने का प्रयास किया गया है…”

इसके बाद हाईकोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के आर. मुथुकृष्णन बनाम कलेक्टर, तिरुवल्लुर जिला (AIR 2011 Madras 186) मामले में दिए गए निर्णय को भी रेखांकित किया:

“उपरोक्त प्रावधानों से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की याचिका में, जिस व्यक्ति के खिलाफ अवमानना का आरोप है, उसे व्यक्तिगत रूप से प्रतिवादी बनाया जाना चाहिए। ‘व्यक्ति’ शब्द का अर्थ एक मानव, एक प्राकृतिक व्यक्ति है न कि एक विधिक (जुरिस्टिक) व्यक्ति, क्योंकि एक मनुष्य ही न्यायालय की अवमानना कर सकता है, कोई प्राधिकरण नहीं। यह स्थापित कानून है कि किसी कॉर्पोरेशन या राज्य या उसके प्राधिकरण को दिया गया आदेश वास्तव में उन व्यक्तियों को दिया गया आदेश होता है जो आधिकारिक रूप से उसके मामलों के संचालन के लिए जिम्मेदार होते हैं।”

कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (अवमानना न्यायालय की कार्यवाही) नियम, 2007 के नियम 349 का भी हवाला दिया। यह नियम स्पष्ट करता है कि याचिकाकर्ता को अवमानना के आरोपी विशिष्ट व्यक्ति का नाम बिल्कुल सटीक रूप से लिखना आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अवमानना क्षेत्राधिकार मुख्य रूप से किसी व्यक्ति के जानबूझकर किए गए अवज्ञाकारी आचरण से जुड़ा होता है। संबंधित अधिकारी की पहचान कर उसे अदालत के समक्ष लाना केवल एक तकनीकी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह जानने के लिए बुनियादी आवश्यकता है कि क्या अवज्ञा सचमुच जानबूझकर की गई थी।

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हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि आदेश का पालन करने के लिए जिम्मेदार व्यक्तिगत अधिकारियों को पहले ही उनके व्यक्तिगत नामों के साथ याचिका में शामिल किया जा चुका है, इसलिए NHAI को एक वैधानिक और विधिक इकाई होने के नाते अवमानना मामले में आवश्यक या उचित पक्षकार नहीं माना जा सकता।

चूंकि याचिका में NHAI को ही एक कॉर्पोरेट अवमाननाकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया था, इसलिए कोर्ट ने माना कि याचिका का प्रारूप त्रुटिपूर्ण है और इसे सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वह उन विशिष्ट व्यक्तिगत अधिकारियों के खिलाफ एक नई अवमानना याचिका दायर कर सकता है जिन्होंने कथित रूप से कोर्ट के आदेशों की अवहेलना की है।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: अरविंद कुमार गोयल बनाम भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण एवं अन्य
वाद संख्या: अवमानना याचिका संख्या 618/2026
पीठ: जस्टिस बिभु दत्त गुरु
निर्णय की तिथि: 19 जून, 2026

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