2014 हिरासत में मौत मामला: बॉम्बे हाईकोर्ट ने आठ पुलिसकर्मियों पर हत्या के आरोप तय करने के आदेश को बरकरार रखा

बॉम्बे हाईकोर्ट ने साल 2014 में अगनेलो वालदारिस की कथित हिरासत में हुई मौत के मामले में आठ पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या के आरोप तय करने के निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा है। आरोपियों की याचिकाओं को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मृतक के लिए न्याय मांगना जीवित लोगों का “नैतिक दायित्व” है और इस मामले की परिस्थितियों को देखते हुए पूर्ण ट्रायल (मुकदमा) आवश्यक है।

जस्टिस ए. एस. गडकरी और जस्टिस श्याम चांडक की खंडपीठ ने सितंबर 2022 के निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसमें पुलिसकर्मियों पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) और 295-A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना) के तहत आरोप तय करने का निर्देश दिया गया था।

लेखिका लोइस मैकमास्टर बुजोल्ड को उद्धृत करते हुए हाईकोर्ट ने कहा, “मृतक न्याय के लिए नहीं पुकार सकते। यह जीवित लोगों का कर्तव्य है कि वे उनके लिए ऐसा करें।” कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यह टिप्पणी उन लोगों के प्रति जवाबदेही और सम्मान सुनिश्चित करने के नैतिक दायित्व को दर्शाती है जो अब इस दुनिया में नहीं हैं।

यह मामला 2014 का है, जब वडाला रेलवे पुलिस ने चोरी के एक मामले में अगनेलो वालदारिस और तीन अन्य को हिरासत में लिया था। याचिकाकर्ता पुलिसकर्मियों का दावा था कि वालदारिस हिरासत से भागने की कोशिश कर रहा था और इसी दौरान ट्रेन की चपेट में आने से उसकी मौत हो गई।

इन याचिकाकर्ताओं में सीनियर इंस्पेक्टर जितेंद्र राठौड़, असिस्टेंट इंस्पेक्टर अर्चना पुजारी, सब-इन्स्पेक्टर शत्रुघ्न तोंडसे, हेड कांस्टेबल सुरेश माने और कांस्टेबल तुषार खैरनार, रवींद्र माने, विकास सूर्यवंशी और सत्यजीत कांबले शामिल हैं।

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हालांकि, हाईकोर्ट ने इस बात पर “गंभीर विवाद” पाया कि मौत आकस्मिक थी या हत्या। जहां पुलिस ‘भागने’ की थ्योरी पर अड़ी रही, वहीं कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत—जिनमें सह-कैदियों के बयान और मेडिकल रिपोर्ट शामिल हैं—हिरासत में प्रताड़ना (कस्टोडियल टॉर्चर) की ओर इशारा करते हैं।

हाईकोर्ट के आदेश में हिरासत में लिए गए लोगों के साथ किए गए कथित व्यवहार के भयावह विवरण दिए गए हैं। कोर्ट ने कहा कि वालदारिस और अन्य को कथित तौर पर अवैध रूप से हिरासत में रखा गया और लॉक-अप के भीतर उनके साथ गंभीर मारपीट और दुर्व्यवहार किया गया।

इन आरोपों की प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए बेंच ने कहा: “यौन शोषण इतना घृणित था कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि पुलिस स्टेशन में ऐसी घटना हो सकती है। मुख्य मुद्दे को ध्यान में रखते हुए, हम सामान्य रूप से पुलिस की छवि की रक्षा के लिए उस दुर्व्यवहार का उल्लेख करना उचित नहीं समझते हैं।”

शारीरिक शोषण के अलावा, कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली में कई गंभीर खामियां गिनाईं:

  • रिकॉर्ड में विसंगतियां: आधिकारिक पुलिस दस्तावेजों में महत्वपूर्ण विसंगतियां पाई गईं।
  • CCTV फुटेज: कोर्ट के निर्देशों के बावजूद सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित नहीं रखा गया।
  • चिकित्सीय लापरवाही: मृतक के लिए दी गई चिकित्सकीय सलाह का पालन नहीं किया गया, जिसमें एक अनुशंसित एक्स-रे परीक्षण भी शामिल था जिसे कभी नहीं कराया गया।
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हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट के जज ने हत्या के आरोप तय करने का आदेश देते समय सही कानूनी मानदंडों का पालन किया है। बेंच ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, यदि मुकदमे के दौरान असत्य साबित नहीं होती है, तो सजा के लिए पर्याप्त आधार है।

याचिकाओं को खारिज करने के साथ ही हाईकोर्ट ने इन आठ पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा चलाने का रास्ता साफ कर दिया है, जिससे हिरासत में हिंसा के इन गंभीर आरोपों की पूरी तरह से न्यायिक जांच सुनिश्चित हो सकेगी।

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