2006 गोवा अपहरण-हत्याकांड: बॉम्बे हाईकोर्ट ने उम्रकैद के दोषी की रिहाई का दिया आदेश, कहा- सजा का मकसद सिर्फ बदला लेना नहीं

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2006 के गोवा अपहरण और हत्याकांड मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे 41 वर्षीय व्यक्ति की समय पूर्व रिहाई का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी अपराध की गंभीरता के आधार पर कैदी की सुधार की संभावनाओं को हमेशा के लिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जस्टिस नीला गोखले और जस्टिस अमित एस. जमसांडेकर की पीठ ने 6 अगस्त के अपने फैसले में गोवा सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत राज्य सजा समीक्षा बोर्ड (एसएसआरबी) की रिहाई संबंधी सिफारिश को खारिज कर दिया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि आधुनिक आपराधिक न्याय प्रणाली सुधारात्मक सिद्धांत पर आधारित है। सजा का उद्देश्य केवल बदला लेना नहीं, बल्कि अपराधी का पुनर्वास और उसे समाज की मुख्यधारा में वापस लाना है। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि रिहाई के लिए इस बात की शत-प्रतिशत गारंटी मांगी जाने लगे कि अपराधी दोबारा अपराध नहीं करेगा, तो यह एक असंभव मानक होगा। ऐसा नियम लागू करने से कोई भी पात्र कैदी कभी जेल से बाहर नहीं आ पाएगा और उसे जीवन भर सलाखों के पीछे ही रहना पड़ेगा।

राज्य सरकार का फैसला गैर-कानूनी करार

यह मामला गोवा सरकार के 1 जनवरी 2026 के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें उसने एसएसआरबी की 2025 की उस सिफारिश को मानने से इनकार कर दिया था, जिसमें याचिकाकर्ता को रिहा करने का सुझाव दिया गया था। समीक्षा बोर्ड ने कैदी के आचरण, शैक्षणिक उपलब्धियों और विभिन्न अधिकारियों की सकारात्मक रिपोर्टों के आधार पर उसकी रिहाई की संस्तुति की थी।

याचिकाकर्ता की ओर से वकील नाइजेल फर्नांडीज ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल ने 14 साल की वास्तविक सजा और छूट मिलाकर लगभग 20 साल की कुल जेल अवधि पूरी कर ली है। इसके बावजूद राज्य सरकार ने केवल मूल अपराध की संवेदनशीलता को आधार बनाकर मनमाने ढंग से रिहाई याचिका खारिज कर दी। वहीं, राज्य सरकार ने दलील दी कि समय पूर्व रिहाई कोई मौलिक अधिकार नहीं बल्कि कार्यपालिका का विशेषाधिकार है। राज्य ने अपराध की योजनाबद्ध प्रकृति, पीड़ित परिवार की पीड़ा और पुलिस अधीक्षक की सुरक्षा संबंधी आशंकाओं का हवाला दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इन तर्कों को अमान्य करते हुए कहा कि रिहाई के निर्णयों में मूल अपराध के बजाय कैदी के वर्तमान व्यवहार और भविष्य में उसके सुधरने की संभावनाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

READ ALSO  बिना सुनवाई प्रभावित पक्ष के खिलाफ पारित एकतरफा आदेश को बहाल नहीं कर सकता पुनरीक्षण अधिकारी; हाईकोर्ट ने गांव सभा भूमि विवाद में कमिश्नर का आदेश रद्द किया

जेल में शैक्षणिक और सामाजिक कार्य से पेश की मिसाल

कोलवाले स्थित सेंट्रल जेल में बिताए समय के दौरान याचिकाकर्ता ने अपनी जीवन शैली में बड़ा बदलाव किया। उसने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) से टूरिज्म स्टडीज में स्नातक, टूरिज्म एंड ट्रैवल मैनेजमेंट में स्नातकोत्तर और फाइनेंस एंड अकाउंटिंग में डिप्लोमा पूरा किया। इसके अतिरिक्त, उसने गोवा चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा आयोजित उद्यमिता कार्यशाला में भी भाग लिया।

जेल परिसर में उसने 2015 से इग्नू केंद्र के संचालन में सहायता की, 2015 से कैंटीन का प्रबंधन संभाला और 2023 से बेकरी अनुभाग का जिम्मा संभाला। वह जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण द्वारा नियुक्त पैरा लीगल वॉलांटियर के रूप में भी कार्यरत रहा और कागज के बैग बनाने का काम भी किया। रिकॉर्ड के अनुसार, पैरोल पर बाहर रहने के दौरान भी उसका आचरण संतोषजनक पाया गया और जिला मजिस्ट्रेट तथा जेल महानिरीक्षक की ओर से उसके खिलाफ कोई प्रतिकूल रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई थी।

2006 का हत्याकांड

READ ALSO  एप्पल इंडिया और क्रोमा को मृतक ग्राहक के परिजनों को खराब iPhone के लिए रिफंड और मुआवज़ा देने का आदेश

यह मामला 2006 में गोवा में कानून के छात्र मंदार सुरलकर के अपहरण और हत्या से जुड़ा है। याचिकाकर्ता सहित चार लोगों को 2014 में इस मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इन लोगों ने सुरलकर का अपहरण कर उसके पिता से 50 लाख रुपये की फिरौती मांगी थी, और बाद में उसकी हत्या कर दी थी। पोस्टमास्टम रिपोर्ट में मौत का कारण गला घोंटना और सिर पर गंभीर चोटें लगना बताया गया था।

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दो दशकों से अधिक समय तक हिरासत में रहने और कैदी के सुधरने के स्पष्ट प्रमाणों को देखते हुए उसे आगे भी जेल में रखना किसी रचनात्मक उद्देश्य को पूरा नहीं करता है।

READ ALSO  क्या रेप पीड़िता मांगलिक है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ विश्वविद्यालय से रिपोर्ट मांगी क्योंकि आरोपी ने इस आधार पर शादी से इनकार किया
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles