बॉम्बे हाईकोर्ट का सख्त निर्देश: फैसला सुनाते ही उसी दिन अपलोड करना होगा आदेश, लापरवाही बरतने पर सस्पेंड होंगे न्यायिक अधिकारी

पारदर्शिता और न्यायिक दक्षता को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र और गोवा के सभी न्यायिक अधिकारियों के लिए एक कड़ा निर्देश जारी किया है। नए आदेश के तहत अब जिस दिन कोई फैसला या आदेश पारित किया जाएगा, उसे उसी दिन केस इंफॉर्मेशन सिस्टम (CIS) सर्वर पर अपलोड करना अनिवार्य होगा।

हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल स्वप्निल सी. खाती द्वारा जारी इस सर्कुलर में स्पष्ट किया गया है कि तय समय सीमा का पालन न करना एक “गंभीर चूक” माना जाएगा। इस कदम का मुख्य उद्देश्य अदालती कार्यवाही और लिखित आदेश की उपलब्धता के बीच होने वाली देरी को खत्म करना है, ताकि वादियों और आम जनता को तुरंत आधिकारिक दस्तावेज मिल सकें।

हाईकोर्ट ने फैसलों को समय पर अपलोड करने की प्रक्रिया को सीधे तौर पर न्यायिक अधिकारी की पेशेवर सत्यनिष्ठा (Integrity) से जोड़ा है। सर्कुलर में कड़े शब्दों में कहा गया है: “आदेशों या फैसलों को समय पर अपलोड न करना एक ऐसा कदाचार है जो न्यायिक अधिकारी की निष्ठा पर सवाल उठाता है।”

आदेश के अनुसार, यदि कोई फैसला उसी दिन अपलोड नहीं किया जाता है, तो संबंधित न्यायिक अधिकारी को देरी के विशिष्ट कारणों का विवरण देना होगा। यह निर्देश प्रमुख जिला एवं सत्र न्यायाधीशों के माध्यम से सभी अधीनस्थ अदालतों को भेज दिया गया है ताकि पूरे महाराष्ट्र और गोवा में इसका एक समान पालन सुनिश्चित किया जा सके।

इन मानकों को सख्ती से लागू करने के लिए हाईकोर्ट प्रशासन ने एक निगरानी प्रणाली भी तैयार की है। अब सभी न्यायिक अधिकारियों को हर महीने एक प्रमाण पत्र जमा करना होगा, जिसमें उन्हें यह पुष्टि करनी होगी कि उनके द्वारा पारित सभी आदेश निर्धारित समय के भीतर अपलोड किए गए हैं।

प्रशासन ने जानकारी में किसी भी तरह की विसंगति पाए जाने पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की चेतावनी दी है। आदेश में कहा गया है, “न्यायिक अधिकारियों को सूचित किया जाता है कि यदि उनके द्वारा दी गई जानकारी में कोई विसंगति पाई जाती है, तो उन्हें विभागीय जांच के बिना ही तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया जाएगा।”

डिजिटल रिकॉर्ड के अलावा, हाईकोर्ट ने भौतिक दस्तावेजों (Physical Records) के रखरखाव को लेकर भी निर्देश दिए हैं। न्यायिक अधिकारियों को आदेश दिया गया है कि किसी मामले का निपटारा होने के बाद वे अदालत की फाइलों को अपने पास नहीं रखेंगे।

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इन निर्देशों का उद्देश्य पूरी न्यायिक प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना है, जिससे वादियों को अदालती फैसलों तक तुरंत पहुंच मिले और निचली अदालतों के कामकाज में अधिक जवाबदेही और गति आए।

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