भूमि अधिग्रहण मामलों में ‘व्यापक व प्रणालीगत विफलता’: बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को मिशन मोड में कार्रवाई का निर्देश, 8 सप्ताह में मुआवजा देने का आदेश

बॉम्बे हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण मामलों के निपटारे में महाराष्ट्र सरकार की “व्यापक और प्रणालीगत विफलता” पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि भूमि का कब्जा लेने के बाद मुआवजा निर्धारित व भुगतान न करना निरंतर गलत (continuing wrong) है और संवैधानिक कर्तव्य का उल्लंघन है। अदालत ने राज्य को सभी लंबित मामलों के समाधान के लिए “मिशन मोड” में काम करने का निर्देश दिया।

औरंगाबाद पीठ की न्यायमूर्ति विभा कंकणवाड़ी और न्यायमूर्ति हितेन वेणगावकर की खंडपीठ ने यह टिप्पणी बीड जिले के उन किसानों की याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिनकी जमीन 1996 में गांव के जलटंकी निर्माण के लिए अधिग्रहित कर ली गई थी, परंतु आज तक न तो अवार्ड पारित हुआ और न ही मुआवजा दिया गया।

सिंचाई विभाग ने 1996 में याचिकाकर्ताओं की भूमि का कब्जा लेकर उसी वर्ष जलटंकी का निर्माण पूरा कर लिया और भूमि सार्वजनिक उपयोग में ले ली गई। इसके बावजूद अधिग्रहण की कार्यवाही पूरी नहीं की गई। याचिका दायर होने के बाद 2018 में 31 लाख रुपये का अवार्ड तय किया गया, लेकिन राशि का भुगतान अभी तक नहीं हुआ।

अदालत ने कहा कि प्रभावित भूमि स्वामी अधिकांशतः कृषक, अशिक्षित या ग्रामीण पृष्ठभूमि के हैं, जिन्हें औपचारिक अधिग्रहण प्रक्रिया या अपने वैधानिक अधिकारों की जानकारी भी नहीं हो सकती।

खंडपीठ ने कहा कि भूमि अधिग्रहण के मामलों में बार-बार सामने आने वाली स्थितियां राज्य प्रशासन की “गंभीर और प्रणालीगत विफलता” को दर्शाती हैं।

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अदालत ने स्पष्ट किया, “एक बार नागरिक की भूमि ले ली जाती है, तो मुआवजा तय करना और उसका भुगतान करना राज्य का पूर्ण दायित्व है।”
साथ ही कहा कि एक कल्याणकारी राज्य “नागरिकों की अज्ञानता या असहायता का लाभ नहीं उठा सकता।”

अदालत ने पाया कि वर्षों तक कार्यवाही लंबित रखने से भूमि स्वामियों को गंभीर क्षति होती है और ब्याज व बढ़ी हुई राशि के रूप में सरकारी खजाने पर भी अनावश्यक बोझ पड़ता है।
यह भी कहा गया कि अधिकारी अपने वैधानिक दायित्व निभाने में विफल रहते हैं, जिसके कारण नागरिकों को न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ता है, और ऐसी स्थिति स्वीकार्य नहीं है।

शासन व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि एक अच्छे राज्य की नींव “अच्छे कानून” और “अच्छे क्रियान्वयन” पर होती है—अर्थात नियमों का पालन और सक्षम प्रशासन।

हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि वह:

  • ऐसे सभी मामलों की राज्यव्यापी पहचान करे जहां भूमि का कब्जा ले लिया गया है लेकिन अवार्ड पारित नहीं हुआ या मुआवजा जमा नहीं किया गया।
  • राजस्व, वित्त, विधि और न्याय विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की समिति बनाकर मिशन मोड में कार्यवाही पूरी करे और एक नोडल अधिकारी नियुक्त करे।
  • लंबित मामलों का वर्गीकरण कर निर्धारित समयसीमा में उन्हें विधिसम्मत रूप से निष्पादित करे।
  • लापरवाही या उदासीनता के लिए जिम्मेदारी तय करे, जिससे सार्वजनिक धन की हानि हो रही है।
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अदालत ने कहा कि वह ऐसी स्थिति में “मूकदर्शक” नहीं रह सकती जहां प्रशासनिक उदासीनता के कारण सार्वजनिक धन और नागरिकों के अधिकार दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

मौजूदा मामले में अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को निर्धारित मुआवजा आठ सप्ताह के भीतर दिया जाए।

अदालत ने कहा कि स्थिति ऐसी हो चुकी है जहां और विलंब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और समयबद्ध तथा निर्णायक हस्तक्षेप आवश्यक है, ताकि नागरिकों और राज्य दोनों के हित सुरक्षित रह सकें।

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