किराएदार के सह-स्वामी बनने पर बेदखली की कार्यवाही जारी नहीं रह सकती; बॉम्बे हाईकोर्ट ने रद्द किया निष्कासन आदेश

बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि रेंट एक्ट के तहत बेदखली की कार्यवाही उस किराएदार के खिलाफ नहीं चलाई जा सकती जो बाद में उसी परिसर का सह-स्वामी (Co-owner) बन जाता है। न्यायमूर्ति राजेश एस. पाटिल ने कहा कि एक बार जब किराएदार संपत्ति में मालिकाना हक का हिस्सा प्राप्त कर लेता है, तो वह ‘दोहरी क्षमता’ (Dual Capacity) में आ जाता है, और ऐसी स्थिति में मौजूदा सह-स्वामी उसे बेदखल करने की प्रक्रिया जारी नहीं रख सकते।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद मूल रूप से श्री कृष्णकुमार के. अशर के खिलाफ दायर एक बेदखली सूट से शुरू हुआ था। मकान मालिकों ने अनधिकृत निर्माण, सबलेटिंग (किराए पर देना), उपयोग में बदलाव, अपनी निजी जरूरत और किराए के बकाया जैसे आधारों पर यह सूट दायर किया था। ट्रायल कोर्ट ने 30 जून 2009 को इस सूट को खारिज कर दिया था, लेकिन बाद में अपीलीय पीठ ने उस आदेश को पलटते हुए मकान मालिकों के पक्ष में फैसला सुनाया।

आवेदक (किराएदार) ने अपीलीय अदालत के इस आदेश को 2014 में सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 115 के तहत बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी। इस पुनरीक्षण याचिका (Revision Application) के लंबित रहने के दौरान, 22 अप्रैल 2016 को आवेदक ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए मूल वादी संख्या 2 (मृतक) के कानूनी उत्तराधिकारियों से एक ‘कन्वेयंस डीड’ के माध्यम से उस इमारत का 50% हिस्सा खरीद लिया।

पक्षों की दलीलें

आवेदक की ओर से पेश वकील कैलाश देवल ने तर्क दिया कि चूंकि अब उनका मुवक्किल उस परिसर का 50% मालिक बन चुका है, इसलिए बेदखली की कार्यवाही स्वतः ही समाप्त हो जानी चाहिए। उन्होंने 1979 के एक पत्राचार का भी हवाला दिया जिसमें एक सह-स्वामी ने किराएदार के खिलाफ सूट जारी रखने का विरोध किया था।

प्रतिवादी संख्या 2 (मूल वादी संख्या 1) की ओर से एडवोकेट मनोज पी. म्हात्रे ने इस रुख का समर्थन किया और कहा कि उनके मुवक्किल अब किराएदार के खिलाफ बेदखली की कार्यवाही को आगे नहीं बढ़ाना चाहते और इसे वापस लेना चाहते हैं।

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वहीं, दूसरे प्रतिवादी श्री क्लाइड आर्ची वारेल ने इसका विरोध किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के P. Anjanappa (D) by LRs. vs. A. P. Nanjundappa & Ors. और Alka Shrirang Chavan & Anr. vs. Hemchandra Rajaram Bhonsale & Ors. जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कार्यवाही जारी रखने की मांग की।

कोर्ट का विश्लेषण

न्यायमूर्ति राजेश एस. पाटिल ने कई सह-स्वामियों वाले बेदखली सूट की कानूनी स्थिति का विश्लेषण किया। सुप्रीम कोर्ट के Mohinder Prasad Jain vs. Manohar Lal Jain (2006) और India Umbrella Mfg. Co. v. Bhagabandei Agarwalla (2004) के फैसलों का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि भले ही एक सह-स्वामी दूसरों के एजेंट के रूप में सूट दायर कर सकता है, लेकिन किसी भी सह-स्वामी का विरोध एक प्रासंगिक तथ्य होता है।

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हाईकोर्ट ने तीन ऐसी स्थितियों को रेखांकित किया जहां बेदखली की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकती:

  1. जब संयुक्त सह-स्वामियों में से एक बेदखली की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से इनकार कर दे।
  2. जब एक सह-स्वामी अपना हिस्सा किसी तीसरे पक्ष को बेच दे और वह पक्ष बेदखली का विरोध करे।
  3. जब किराएदार स्वयं संपत्ति का कुछ हिस्सा खरीदकर सह-स्वामी बन जाए।

आवेदक की दोहरी स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:

“उपरोक्त विश्लेषण के आलोक में, मेरी राय में एक बार जब किराएदार सह-स्वामी भी बन जाता है, तो वह दोहरी क्षमता में होता है – खरीदे गए हिस्से की सीमा तक मालिकाना हक और वर्तमान तिथि तक किराएदारी समझौते की सीमा तक किराएदार। जैसे ही वह स्वामित्व का एक हिस्सा खरीदता है, दूसरा सह-स्वामी उसके खिलाफ रेंट एक्ट के तहत बेदखली की कार्यवाही शुरू या जारी नहीं रख सकता।”

अदालत ने प्रतिवादी द्वारा दिए गए संदर्भों को खारिज करते हुए कहा कि वे मामले ‘रिलीज डीड’ की वैधता या ‘स्पेसिफिक परफॉरमेंस’ से संबंधित थे और इस मामले पर लागू नहीं होते जहां किराएदार ने 50% मालिकाना हक प्राप्त कर लिया है।

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अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने सिविल रिवीजन एप्लीकेशन को स्वीकार करते हुए अपीलीय अदालत के फैसले और डिक्री को रद्द कर दिया। इसके साथ ही ट्रायल कोर्ट का मूल निर्णय बहाल कर दिया गया।

इसके अलावा, कोर्ट ने किराएदार द्वारा जमा किए गए ‘बाजार किराए’ (Market Rent) के मुद्दे पर भी आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट के Atmaram Properties vs. Federal Motors (2005) मामले के निर्देशों के तहत आवेदक ने अदालत में राशि जमा की थी। हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि आवेदक की सफलता को देखते हुए, 2017 से अब तक जमा किए गए लगभग ₹60,00,000/- और उस पर अर्जित ब्याज आवेदक को वापस लौटाया जाए।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: श्री कृष्णकुमार के. अशर बनाम आर्ची जॉन वारेल एवं अन्य
  • केस संख्या: सिविल रिवीजन एप्लीकेशन नंबर 752/2014
  • पीठ: न्यायमूर्ति राजेश एस. पाटिल
  • तारीख: 7 अप्रैल, 2026

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