‘लोकतंत्र जागरूकता से फलता-फूलता है, जबरदस्ती से नहीं’: अनिवार्य मतदान की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने देश में मतदान को अनिवार्य बनाने के निर्देश देने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह का कोई भी आदेश देना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और यह पूरी तरह से “नीतिगत डोमेन” (Policy Domain) का मामला है।

चीफ जस्टिस सूर्या कांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने टिप्पणी की कि एक लोकतांत्रिक समाज में, जहाँ कानून का शासन है, चुनावी भागीदारी कानूनी मजबूरी के बजाय सार्वजनिक जागरूकता से आनी चाहिए।

याचिकाकर्ता अजय गोयल ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर अनिवार्य मतदान लागू करने की मांग की थी। याचिका में तर्क दिया गया था कि जानबूझकर वोट न देने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया कि जो लोग वोट नहीं देते, उन्हें मिलने वाली सरकारी सुविधाओं और लाभों पर प्रतिबंध लगाने के लिए चुनाव आयोग को दिशा-निर्देश जारी किए जाने चाहिए।

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए अनिवार्य मतदान आवश्यक है। उनकी मांगों में शामिल था:

  • जानबूझकर मतदान न करने वालों के लिए सरकारी लाभों को सीमित करने वाले दिशा-निर्देश।
  • चुनावी प्रक्रिया में शामिल न होने पर दंडात्मक परिणाम तय करना।
  • चुनाव आयोग को एक समिति बनाने का निर्देश देना, जो वोट न देने वालों पर प्रतिबंध लगाने के उपाय सुझाए।
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सुनवाई के दौरान, पीठ ने याचिका में की गई मांगों की व्यवहार्यता और दर्शन पर गंभीर सवाल उठाए। चीफ जस्टिस सूर्या कांत ने कहा कि भारत ने पिछले 75 वर्षों में लोकतंत्र में अटूट विश्वास दिखाया है, जो नागरिकों की स्वैच्छिक भागीदारी पर निर्भर करता है।

चीफ जस्टिस ने कहा, “एक ऐसे देश में जो कानून के शासन द्वारा शासित है और लोकतंत्र में विश्वास करता है, जहाँ हमने 75 वर्षों से दिखाया है कि हम इसमें कितना भरोसा करते हैं, हर किसी से (वोट देने) जाने की उम्मीद की जाती है। यदि वे नहीं जाते हैं, तो वे नहीं जाते हैं। जिसकी आवश्यकता है वह जागरूकता है, लेकिन हम मजबूर नहीं कर सकते।”

अदालत ने मतदान के दिन घर पर रहने के कृत्य को अपराध की श्रेणी में रखने के तर्क पर भी सवाल उठाया। सरकारी सुविधाओं पर रोक लगाने के सुझाव पर चीफ जस्टिस ने पूछा, “क्या हमें उन्हें गिरफ्तार करने का निर्देश देना चाहिए? यदि कोई नागरिक मतदान के लिए नहीं जाता है, तो हम क्या कर सकते हैं?”

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पीठ ने अनिवार्य मतदान कानून से जुड़ी व्यावहारिक और सामाजिक-आर्थिक कठिनाइयों का भी उल्लेख किया:

  1. कामकाजी पेशेवर: कोर्ट ने कहा कि मतदान के दिन कई नागरिकों, जिनमें जज भी शामिल हैं, को काम करना पड़ता है। चीफ जस्टिस ने उदाहरण देते हुए कहा, “अगर हम इसे स्वीकार करते हैं, तो मेरे साथी जस्टिस बागची को वोट देने के लिए पश्चिम बंगाल जाना होगा, भले ही वह कार्य दिवस हो।” इस पर जस्टिस बागची ने कहा, “न्यायिक कार्य भी महत्वपूर्ण है।”
  2. वंचित वर्ग: कोर्ट ने समाज के गरीब और मजदूर वर्ग के प्रति चिंता व्यक्त की। पीठ ने पूछा, “अगर कोई गरीब व्यक्ति कहता है, ‘मुझे अपनी दिहाड़ी कमानी है, मैं वोट कैसे दूँ?’ तो हमें उनसे क्या कहना चाहिए?”
  3. शक्तियों का पृथक्करण: कोर्ट ने दोहराया कि ये मुद्दे “नीतिगत डोमेन” के अंतर्गत आते हैं, जिसका अर्थ है कि इन पर निर्णय लेना विधायिका और कार्यपालिका का काम है, न्यायपालिका का नहीं।
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सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा कि न्यायपालिका नीतिगत मामलों में आदेश जारी नहीं कर सकती। पीठ ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे अपनी शिकायतों और सुझावों के साथ संबंधित हितधारकों (Stakeholders) के पास जाएँ।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला, “हमें डर है कि ये मुद्दे नीतिगत डोमेन में आते हैं।” कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र जबरदस्ती से नहीं बल्कि जागरूकता से चलता है।

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