भोजशाला विवाद: जैन मंदिर व गुरुकुल होने के दावे वाली याचिका पर एमपी हाईकोर्ट ने मांगा जवाब, 2 अप्रैल को अगली सुनवाई

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शुक्रवार को धार जिले स्थित विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर से जुड़े एक नए दावे पर राज्य सरकार और अन्य पक्षकारों से जवाब मांगा है। याचिका में दावा किया गया है कि इस परिसर में मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल मौजूद था। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 2 अप्रैल तय की है।

इंदौर खंडपीठ के समक्ष दायर इस जनहित याचिका को दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता सालेक चंद जैन ने दाखिल किया है। याचिका में जैन समुदाय को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित इस परिसर में पूजा-अर्चना का अधिकार देने की मांग की गई है। यह वही परिसर है, जिस पर पहले से ही हिंदू और मुस्लिम पक्ष अपने-अपने धार्मिक दावे कर रहे हैं।

भोजशाला परिसर को लेकर पहले से हाईकोर्ट में कई मामले लंबित हैं, जिनमें इसके धार्मिक स्वरूप को लेकर विवाद है। हिंदू पक्ष, ASI की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट के आधार पर, इसे देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर बताता है। वहीं मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद होने का दावा करता है।

नई याचिका में जैन पक्ष ने दावा किया है कि यह स्थल मूल रूप से जैन मंदिर और गुरुकुल था। याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 के तहत जैन समुदाय को यहां पूजा करने का अधिकार प्राप्त है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि जिस प्रतिमा को हिंदू पक्ष वाग्देवी (देवी सरस्वती) मानता है, वह वास्तव में जैन धर्म की यक्षिणी अंबिका की प्रतिमा है। दावा किया गया है कि यह प्रतिमा 1034 ईस्वी में धार के राजा भोज द्वारा स्थापित की गई थी।

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याचिका के अनुसार, यह प्रतिमा 1875 में ब्रिटिश शासन के दौरान मिली थी और वर्तमान में लंदन के एक संग्रहालय में रखी हुई है। याचिकाकर्ता ने इस प्रतिमा को भारत वापस लाकर भोजशाला परिसर में पुनः स्थापित करने की मांग की है।

एएसआई सर्वे रिपोर्ट के निष्कर्ष

हाईकोर्ट के पूर्व आदेश पर ASI द्वारा किए गए वैज्ञानिक सर्वे में 2000 से अधिक पृष्ठों की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी। इस रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि वर्तमान ढांचे से पहले इस स्थल पर परमार शासकों के काल का एक विशाल संरचना मौजूद थी और मौजूदा ढांचा पूर्व के मंदिरों के अवशेषों का उपयोग कर बनाया गया हो सकता है।

इतिहास के अनुसार, परमार वंश ने 9वीं से 13वीं शताब्दी तक मालवा क्षेत्र, जिसमें वर्तमान मध्य प्रदेश का धार भी शामिल है, पर शासन किया था।

सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों ने इस याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह मामला जनहित याचिका के रूप में सुनवाई योग्य नहीं है।

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न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति राजेश कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने सभी पक्षकारों को निर्देश दिया कि वे 2 अप्रैल से पहले अपने जवाब और आपत्तियां दाखिल करें।

भोजशाला परिसर को लेकर ASI ने 7 अप्रैल 2003 को एक व्यवस्था लागू की थी। इसके तहत हिंदुओं को हर मंगलवार को पूजा करने की अनुमति है, जबकि मुस्लिम समुदाय को हर शुक्रवार को नमाज अदा करने की इजाजत दी गई है।

अब जैन समुदाय के दावे के साथ इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद में एक नया आयाम जुड़ गया है, जिस पर हाईकोर्ट आगामी सुनवाई में विचार करेगा।

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