सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम का ऐतिहासिक कदम: इलाहाबाद हाईकोर्ट में 5 सेवानिवृत्त जजों की एड-हॉक’ जज के रूप में नियुक्ति की सिफारिश

न्यायिक रिक्तियों और मुकदमों के भारी बैकलॉग से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में पांच सेवानिवृत्त जजों को ‘एड-हॉक’ (तदर्थ) जजों के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की है। यह निर्णय 3 फरवरी, 2026 को आयोजित कॉलेजियम की बैठक में लिया गया।

यह सिफारिश संविधान के अनुच्छेद 224-A के तहत की गई है, जो न्यायपालिका में एक दुर्लभ लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान है। कॉलेजियम ने इन जजों की नियुक्ति दो साल की अवधि के लिए करने का प्रस्ताव मंजूर किया है।

सिफारिश किए गए जजों के नाम

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कॉलेजियम ने निम्नलिखित पांच सेवानिवृत्त जजों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में नियुक्त करने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी है:

  1. श्री न्यायमूर्ति मो. फैज आलम खान
  2. श्री न्यायमूर्ति मो. असलम
  3. श्री न्यायमूर्ति सैयद आफताब हुसैन रिजवी
  4. श्रीमती न्यायमूर्ति रेणु अग्रवाल
  5. श्रीमती न्यायमूर्ति ज्योत्सना शर्मा

अनुच्छेद 224-A का महत्व और कानूनी पहलू

संविधान का अनुच्छेद 224-A हाईकोर्ट में सेवानिवृत्त जजों की नियुक्ति से संबंधित है। इसे अक्सर ‘डॉकेट विस्फोट’ (मुकदमों की बाढ़) को नियंत्रित करने के लिए एक संवैधानिक हथियार माना जाता है।

  • क्या है प्रावधान: इस अनुच्छेद के तहत, किसी राज्य के हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उस हाईकोर्ट या किसी अन्य हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज से अनुरोध कर सकता है कि वह हाईकोर्ट के जज के रूप में कार्य करें।
  • शक्तियां और अधिकार: इस अनुच्छेद के तहत नियुक्त जज को राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित भत्ते मिलते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके पास उस हाईकोर्ट के जज की सभी अधिकारिता, शक्तियां और विशेषाधिकार होते हैं। हालांकि, उन्हें हाईकोर्ट का ‘जज’ नहीं माना जाता है (वरिष्ठता या स्थानांतरण के उद्देश्यों के लिए)।
  • उद्देश्य: इस प्रावधान का उपयोग तब किया जाता है जब कोर्ट में पेंडेंसी (लंबित मामले) बहुत अधिक हो जाती है और अनुभवी न्यायिक हाथों की आवश्यकता होती है। लोक प्रहरी मामले (2021) में सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुच्छेद को सक्रिय करने के लिए दिशानिर्देश भी जारी किए थे।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट, जो देश में सबसे अधिक मुकदमों के बोझ वाले न्यायालयों में से एक है, के लिए यह कदम अत्यंत राहतकारी साबित हो सकता है। यह सिफारिश अब अंतिम मंजूरी और अधिसूचना के लिए केंद्र सरकार के पास जाएगी।

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