रिप्रेजेंटेशन पर फैसला लेने में बिना वजह देरी संवैधानिक आदेश का उल्लंघन, नजरबंदी अवैध: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकार द्वारा किसी नजरबंद व्यक्ति (डिटेन्यू) के रिप्रेजेंटेशन (प्रत्यावेदन) पर निर्णय लेने में बिना किसी उचित स्पष्टीकरण के की गई देरी संविधान के अनुच्छेद 22(5) के तहत मिले संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने माना कि ऐसी देरी बची हुई नजरबंदी (प्रिवेंटिव डिटेंशन) को पूरी तरह से अवैध बना देती है। जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस सुभेंदु सामंत की डिवीजन बेंच ने एक नजरबंद व्यक्ति की पत्नी द्वारा दायर की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका को स्वीकार करते हुए नजरबंदी के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने रिप्रेजेंटेशन पर फैसला लेने में हुई 32 दिनों की असंवैधानिक देरी के कारण नजरबंद व्यक्ति को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले के अनुसार, चीमपार्थी फकरुद्दीन को आंध्र प्रदेश प्रिवेंशन ऑफ डेंजरस एक्टिविटीज ऑफ बूटलेगर्स, डकैत, ड्रग ऑफेंडर्स, गुंडा, इमोरल ट्रैफिक ऑफेंडर्स एंड लैंड ग्रैबर्स एक्ट, 1986 के तहत नजरबंद किया गया था। वाईएसआर कडप्पा जिले के कलेक्टर और जिला मजिस्ट्रेट ने 2 सितंबर 2025 को फकरुद्दीन के खिलाफ लंबित आठ आपराधिक मामलों को ध्यान में रखते हुए नजरबंदी का आदेश जारी किया था।

राज्य सरकार ने 11 सितंबर 2025 को नजरबंदी के इस आदेश को अपनी मंजूरी दी। इसके बाद, एडवाइजरी बोर्ड ने 26 सितंबर 2025 की बैठक में नजरबंदी के पर्याप्त आधार होने की पुष्टि की, जिसके आधार पर राज्य सरकार ने 24 अक्टूबर 2025 को इस आदेश को 12 महीने की अवधि के लिए कन्फर्म कर दिया।

नजरबंदी की शुरुआत में फकरुद्दीन ने कोई रिप्रेजेंटेशन दायर नहीं किया था, लेकिन कन्फर्मेशन आदेश जारी होने के बाद उन्होंने 27 अक्टूबर 2025 को सरकार को एक रिप्रेजेंटेशन भेजकर अपनी रिहाई और नजरबंदी के आदेश को रद्द करने की मांग की। हाईकोर्ट में याचिका लंबित रहने के दौरान ही राज्य सरकार ने 6 जनवरी 2026 को इस रिप्रेजेंटेशन को खारिज कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी हेबियस कॉर्पस याचिका के जरिए इस नजरबंदी को चुनौती दी।

दोनों पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील श्री डी. पूर्णा चंद्र रेड्डी ने नजरबंदी को दो मुख्य आधारों पर चुनौती दी। पहला, उन्होंने तर्क दिया कि 27 अक्टूबर 2025 को प्रस्तुत किए गए रिप्रेजेंटेशन को बिना किसी स्पष्टीकरण के एक लंबी देरी के बाद 6 जनवरी 2026 को खारिज किया गया। उनका कहना था कि कानून के तहत ऐसे रिप्रेजेंटेशन पर तुरंत और तेजी से विचार किया जाना चाहिए। दूसरा, उन्होंने तर्क दिया कि जब नजरबंदी का आदेश जारी किया गया था, तब फकरुद्दीन पहले से ही एक अन्य आपराधिक मामले में न्यायिक हिरासत (जुडिशियल कस्टडी) में थे। इसके बावजूद, जिला कलेक्टर ने इस बात की संतुष्टि दर्ज नहीं की कि उनके जमानत पर रिहा होने की कोई संभावना थी।

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दूसरी तरफ, प्रतिवादी (राज्य सरकार) की ओर से पेश सरकारी वकील श्री कीर्ति तेजा कोंडावेती ने रिप्रेजेंटेशन की समयसीमा कोर्ट के सामने रखी। उन्होंने बताया कि 27 अक्टूबर 2025 को मिले रिप्रेजेंटेशन को टिप्पणियों (रिमार्क्स) के लिए 6 नवंबर 2025 को जिला कलेक्टर को भेजा गया था। जिला कलेक्टर से ये टिप्पणियां 3 दिसंबर 2025 को प्राप्त हुईं और इसके बाद 6 जनवरी 2026 को रिप्रेजेंटेशन खारिज कर दिया गया।

सरकारी वकील ने यह स्वीकार किया कि न तो रिजेक्शन ऑर्डर में और न ही सरकार के जवाबी हलफनामे (काउंटर एफिडेविट) में इस अवधि के दौरान हुई देरी का कोई स्पष्टीकरण दिया गया है। हालांकि, उन्होंने तर्क दिया कि यदि रिप्रेजेंटेशन के निपटारे में देरी के कारणों का खुलासा नहीं भी किया गया हो, तो भी इससे मूल नजरबंदी आदेश अवैध नहीं होगा, बल्कि केवल आगे की नजरबंदी ही अवैध मानी जा सकती है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने अपने विश्लेषण में नजरबंद व्यक्ति के उस संवैधानिक अधिकार पर ध्यान केंद्रित किया, जिसके तहत उसके रिप्रेजेंटेशन पर त्वरित विचार किया जाना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा ‘के.एम. अब्दुल्ला कुन्ही और बी.एल. अब्दुल कादर बनाम भारत संघ’ मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 22(5) सरकार पर यह कानूनी दायित्व डालता है कि वह रिप्रेजेंटेशन पर जल्द से जल्द विचार करे।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को उद्धृत किया:

“रिप्रेजेंटेशन व्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित है, जो हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित एक अत्यंत मूल्यवान अधिकार है। इसलिए, अनुच्छेद 22 का खंड (5) सरकार पर यह कानूनी दायित्व डालता है कि वह रिप्रेजेंटेशन पर जितनी जल्दी हो सके विचार करे। यह संबंधित प्राधिकारी को दिया गया एक संवैधानिक आदेश है कि जिसके पास भी नजरबंद व्यक्ति अपना रिप्रेजेंटेशन जमा करता है, वह उस पर विचार करे और उसका निपटारा जल्द से जल्द करे।”

कोर्ट ने आगे रेखांकित किया:

“रिप्रेजेंटेशन के निपटारे में बिना किसी स्पष्टीकरण के की गई कोई भी देरी संवैधानिक अनिवार्यता का उल्लंघन होगी और यह आगे की नजरबंदी को अमान्य और अवैध बना देगी।”

हाईकोर्ट ने अन्य न्यायिक मिसालों जैसे ‘राजम्मल बनाम तमिलनाडु राज्य’, ‘पवित्र एन. राणा बनाम भारत संघ’ और ‘राशिद कपाड़िया बनाम मेधा गाडगिल’ के फैसलों पर भी चर्चा की। इन सभी मामलों में स्पष्ट किया गया था कि रिप्रेजेंटेशन पर निर्णय लेने में अनुचित और अस्पष्टीकृत देरी नजरबंदी को जारी रखने के लिए घातक साबित होती है।

कोर्ट ने ‘अब्दुल नासर एडम इस्माइल बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि रिप्रेजेंटेशन के निपटारे में होने वाली देरी से मूल नजरबंदी आदेश की वैधता पर तो असर नहीं पड़ता, लेकिन यह आगे की नजरबंदी को अवैध घोषित करने के लिए पर्याप्त है।

इन सिद्धांतों को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि जिला कलेक्टर से टिप्पणियां प्राप्त होने की तिथि (3 दिसंबर 2025) से लेकर खारिज किए जाने की तिथि (6 जनवरी 2026) के बीच 32 दिनों की देरी हुई थी। कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामले में इतना लंबा समय लेना पूरी तरह से अनुचित है। चूंकि राज्य सरकार जवाबी हलफनामे या खारिज करने के आदेश में इस देरी की कोई भी वाजिब वजह बताने में पूरी तरह विफल रही, इसलिए कोर्ट ने माना कि फकरुद्दीन को आगे हिरासत में रखना पूरी तरह असंवैधानिक है।

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हाईकोर्ट का निर्णय

चूंकि याचिका को रिप्रेजेंटेशन पर निर्णय लेने में हुई बिना स्पष्टीकरण की देरी के आधार पर स्वीकार कर लिया गया था, इसलिए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसे डिटेन्यू की न्यायिक हिरासत और जमानत मिलने की संभावना से जुड़े दूसरे आधार की जांच करने की आवश्यकता नहीं है।

हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए 2 सितंबर 2025 के मूल नजरबंदी आदेश और 24 अक्टूबर 2025 के कन्फर्मेशन आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि नजरबंद व्यक्ति शेख सिम्पति उर्फ चीमपार्थी फकरुद्दीन उर्फ गोरेसाब फकरुद्दीन उर्फ पोंगोडु उर्फ बोंगोडु उर्फ थेल्लोडु को तुरंत रिहा किया जाए, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में न्यायिक हिरासत के आदेश के अधीन न हो।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: चीमपार्थी शाहीन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और तीन अन्य
वाद संख्या: रिट पिटीशन संख्या 34357 ऑफ 2025
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस सुभेंदु सामंत
निर्णय की तिथि: 1 जुलाई 2026

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