आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी शामिल थे, ने एक निवारक नजरबंदी (प्रिवेंटिव डिटेंशन) आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि पहले से न्यायिक हिरासत में मौजूद किसी व्यक्ति के खिलाफ नजरबंदी आदेश पारित करते समय डिटेनिंग अथॉरिटी अनिवार्य “ट्रिपल टेस्ट” (तीन शर्तों) को संतुष्ट करने और उसका उल्लेख करने में विफल रही। याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नजरबंदी आदेश के लिए सरकारी मंजूरी की 12 दिनों की वैधानिक अवधि की गणना करते समय उस तारीख को शामिल नहीं किया जाएगा जिस दिन आदेश पारित किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला याचिकाकर्ता चिंतापल्ली सत्यवती द्वारा दायर रिट याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने अपने संबंधी चिंतापल्ली रामू के खिलाफ जारी प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश को चुनौती दी थी। 19 सितंबर 2025 को राजमहेंद्रवरम स्थित ईस्ट गोदावरी के कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट ने आंध्र प्रदेश प्रिवेंशन ऑफ डेंजरस एक्टिविटीज ऑफ बूटलेगर्स, डकैत, ड्रग ऑफेंडर्स, गुंडाज, इमोरल ट्रैफिक ऑफेंडर्स एंड लैंड ग्रैबर्स एक्ट, 1986 की धारा 3(1) और 3(2) के साथ पठित धारा 2(बी) के तहत यह नजरबंदी आदेश जारी किया था।
इसके बाद राज्य सरकार ने 1 अक्टूबर 2025 को आदेश जारी कर इस नजरबंदी को मंजूरी दी और 12 नवंबर 2025 के आदेश के तहत 22 सितंबर 2025 से 12 महीने की अवधि के लिए इसकी पुष्टि की। याचिकाकर्ता ने नजरबंदी आदेश को रद्द करने और हिरासत में लिए गए व्यक्ति को रिहा करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने दो मुख्य कानूनी आधार उठाए:
- मंजूरी में देरी: 1986 के अधिनियम की धारा 3(3) के अनुसार, नजरबंदी आदेश को 12 दिनों के भीतर सरकार द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 19 सितंबर 2025 के आदेश को 1 अक्टूबर 2025 को मंजूरी दी गई थी, जो आदेश की तारीख से गिनती करने पर 12 दिन की समय सीमा से अधिक है। इसके समर्थन में मद्रास हाईकोर्ट के अरुण प्रशांत बनाम तमिलनाडु राज्य मामले के फैसले का हवाला दिया गया।
- ट्रिपल टेस्ट का पालन न होना: हिरासत में लिया गया व्यक्ति ग्राउंड नंबर 4, 5, 6 और 7 में दर्ज आपराधिक मामलों के संबंध में पहले से ही न्यायिक हिरासत में था, जबकि ग्राउंड नंबर 1, 2 और 3 में उसे जमानत मिल चुकी थी। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यद्यपि डिटेनिंग अथॉरिटी ने वास्तविक हिरासत का ध्यान रखा, लेकिन वह यह दर्ज करने में विफल रही कि क्या व्यक्ति के जमानत पर रिहा होने की वास्तविक संभावना थी और क्या रिहा होने पर वह फिर से कानून-व्यवस्था के प्रतिकूल गतिविधियों में लिप्त होगा। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के चैंपियन आर. संगमा बनाम मेघालय राज्य निर्णय का हवाला दिया।
इसके जवाब में सरकारी वकील ने दलील दी:
- 12 दिनों की अवधि की गणना: नजरबंदी आदेश की तारीख को छोड़कर, 1 अक्टूबर 2025 का सरकारी अनुमोदन धारा 3(3) के तहत वैधानिक 12-दिवसीय अवधि के भीतर आता है। राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के जितेन्द्र त्यागी बनाम दिल्ली प्रशासन एवं अन्य मामले का हवाला दिया और कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 की धारा 3(4) में 1986 के अधिनियम की धारा 3(3) जैसी ही भाषा है।
- हिरासत पर विचार: राज्य ने स्वीकार किया कि हालांकि डिटेनिंग अथॉरिटी को न्यायिक हिरासत की जानकारी थी, लेकिन ट्रिपल टेस्ट के बाकी दो पहलुओं पर कोई संतोषजनक विचार नजरबंदी आदेश के अवलोकन से स्पष्ट नहीं होता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने मामले का निपटारा करने के लिए तीन मुख्य कानूनी प्रश्न तय किए:
1. 12 दिनों की अनुमोदन अवधि की गणना
1986 के अधिनियम की धारा 3(3) का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने वैधानिक प्रावधान पर जोर दिया, जिसमें कहा गया है कि “निर्मित किए जाने के बाद ऐसा कोई भी आदेश तब तक बारह दिनों से अधिक समय के लिए लागू नहीं रहेगा, जब तक कि इस बीच सरकार द्वारा इसे मंजूरी न दे दी गई हो।”
“पारित होने के बाद” (आफ्टर द मेकिंग देयरऑफ) अभिव्यक्ति की व्याख्या करते हुए जस्टिस रवि नाथ तिलहरी ने माना कि 12 दिनों की गणना करते समय नजरबंदी आदेश की तारीख को बाहर रखा जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जितेन्द्र त्यागी मामले के फैसले पर भरोसा जताया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि “बारह दिनों की अवधि की गणना निवारक नजरबंदी का आदेश ‘पारित होने के बाद’ की जानी चाहिए। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि बारह दिनों की अवधि नजरबंदी का आदेश दिए जाने के बाद से शुरू होती है।”
हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि यही व्याख्या 1986 के अधिनियम की धारा 3(3) पर भी लागू होती है। 19 सितंबर 2025 की तारीख को छोड़कर 20 सितंबर 2025 से गिनती करने पर, 1 अक्टूबर 2025 को दी गई मंजूरी 12 दिन की समय सीमा के भीतर थी। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अरुण प्रशांत का मामला अलग था और इस मामले में लागू नहीं होता। इसके परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता का पहला आधार खारिज कर दिया गया।
2. ‘ट्रिपल टेस्ट’ का पालन न होना
दूसरे मुद्दे पर, हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के चैंपियन आर. संगमा बनाम मेघालय राज्य मामले का परीक्षण किया, जिसने कमरुन्निसा बनाम भारत संघ में स्थापित सिद्धांतों को दोहराया था। अदालत ने नोट किया कि न्यायिक हिरासत में मौजूद व्यक्तियों के खिलाफ निवारक नजरबंदी आदेश तभी पारित किया जा सकता है जब डिटेनिंग अथॉरिटी तीन अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करती हो:
“(1) यदि आदेश पारित करने वाला प्राधिकरण इस तथ्य से अवगत है कि वह वास्तव में हिरासत में है; (2) यदि उसके पास उसके समक्ष प्रस्तुत विश्वसनीय सामग्री के आधार पर यह विश्वास करने का कारण है कि (क) उसके जमानत पर रिहा होने की वास्तविक संभावना है, और (ख) इस प्रकार रिहा होने पर वह पूरी संभावना के साथ नुकसानदेह गतिविधियों में लिप्त होगा; और (3) यदि उसे ऐसा करने से रोकने के लिए हिरासत में रखना आवश्यक महसूस होता है।”
हाईकोर्ट ने पाया कि यद्यपि डिटेनिंग अथॉरिटी ने पहली शर्त पूरी की, लेकिन वह ट्रिपल टेस्ट की शेष शर्तों के संबंध में अपनी संतुष्टि दर्ज करने में पूरी तरह विफल रही।
अंतिम निर्णय
चूंकि डिटेनिंग अथॉरिटी ट्रिपल टेस्ट के अनिवार्य तत्वों को पूरा करने और उन्हें रिकॉर्ड पर लाने में विफल रही, इसलिए हाईकोर्ट ने माना कि नजरबंदी का आदेश और उसकी बाद की पुष्टि कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं है।
हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए 19 सितंबर 2025 के नजरबंदी आदेश और 12 नवंबर 2025 के पुष्टि आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि हिरासत में लिए गए व्यक्ति की किसी अन्य मामले में आवश्यकता न हो, तो उसे तुरंत रिहा कर दिया जाए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: चिंतापल्ली सत्यवती बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं 3 अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 29553 / 2025
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी
निर्णय की तिथि: 14.07.2026

