इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ पीठ) ने 40 साल से अधिक समय से लंबित एक आपराधिक अपील का निपटारा करते हुए एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है। जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस जफीर अहमद की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि यदि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 313 के तहत आरोपी का बयान निरस्त हो चुकी दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 के निर्धारित प्रोफार्मा (प्रारूप) पर दर्ज किया जाता है, तो यह केवल एक प्रक्रियात्मक अनियमितता (procedural irregularity) है। कोर्ट ने कहा कि जब तक इससे आरोपी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव (prejudice) नहीं पड़ता, तब तक यह पूरे ट्रायल को दूषित या अवैध नहीं बनाता।
इस फैसले के साथ, कोर्ट ने 1979 में गोंडा जिले में हुई एक हत्या के मामले में दो दोषियों की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है।
कानूनी मुद्दा: पुराना प्रोफार्मा बनाम नया कानून
इस अपील में बचाव पक्ष द्वारा उठाया गया मुख्य कानूनी तर्क यह था कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों के बयान धारा 313 CrPC (नye कानून) के तहत दर्ज किए थे, लेकिन इसके लिए इस्तेमाल किया गया फॉर्म धारा 364 (पुराने कानून 1898) का था। बचाव पक्ष का कहना था कि यह न्यायिक मस्तिष्क का प्रयोग न करने (non-application of mind) का संकेत है और इससे पूरा ट्रायल अवैध हो जाता है।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। पीठ ने CrPC, 1973 की धारा 484(2)(b) का हवाला देते हुए कहा कि पुराने कोड के तहत निर्धारित फॉर्म नए कोड के प्रावधानों के तहत ही माने जाएंगे। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“अदालत का विचार है कि यह एक अनियमितता हो सकती है, लेकिन इसे ऐसी अवैधता नहीं कहा जा सकता जिससे पूरा ट्रायल दूषित हो जाए… यह कानून में तय है कि केवल गलत प्रावधान का उल्लेख करने से कोई आदेश या कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती, जब तक कि आरोपी को इससे कोई स्पष्ट नुकसान न हुआ हो।”
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 8 मार्च 1979 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता राजेंद्र प्रसाद और उनके चाचा राम शंकर (मृतक) ग्राम खमरिया से वापस लौट रहे थे। रास्ते में ग्राम पटखौली के पास आरोपी राम नारायण, ज्ञानेंद्री, राम फेर, राम उगरा और अन्य ने उन पर लाठी, बल्लम और फरसा से हमला कर दिया।
हमले का कारण पुरानी रंजिश बताई गई थी। आरोपी राम नारायण के पिता समई दीन की हत्या के मामले में शिकायतकर्ता और मृतक आरोपी थे और घटना से केवल 22 दिन पहले ही जमानत पर रिहा हुए थे।
आरोपियों ने राम शंकर को खेत में घसीटा और उनकी बेरहमी से हत्या कर दी। इस मामले में पुलिस थाना कोतवाली देहात, गोंडा में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। 18 जून 1982 को द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, गोंडा ने आरोपियों को आईपीसी की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं (दोषियों) के वकीलों ने तकनीकी और तथ्यात्मक दोनों आधारों पर सजा को चुनौती दी:
- तकनीकी आपत्ति: बयान दर्ज करने में पुराने प्रोफार्मा का उपयोग ट्रायल को अवैध बनाता है। इसके अलावा, जिस जज ने फैसला सुनाया, उनके पास केस ट्रांसफर के बाद अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) का अभाव था।
- साक्ष्यों पर आपत्ति: गवाह मृतक के रिश्तेदार (interested witnesses) हैं और मेडिकल रिपोर्ट चश्मदीद गवाहों के बयानों से मेल नहीं खाती।
राज्य सरकार की ओर से पेश हुए ए.जी.ए. ने तर्क दिया कि पुराने फॉर्म का उपयोग केवल एक अनियमितता है जिसे सुधारा जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि एफआईआर तत्काल दर्ज की गई थी और गवाहों के बयान मेडिकल रिपोर्ट के अनुरूप हैं।
कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
हाईकोर्ट ने मामले के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद निम्न निष्कर्ष निकाले:
- प्रक्रियात्मक त्रुटि: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 313 CrPC के तहत बयान दर्ज करना आरोपी का एक मूल्यवान अधिकार है, लेकिन केवल पुराने फॉर्म के उपयोग से यह अधिकार नहीं छिनता। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (इंद्रकुंवर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य आदि) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता यह साबित करने में विफल रहे कि इस प्रक्रियात्मक चूक से उनके बचाव पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
- जज का अधिकार क्षेत्र: कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच करने पर पाया कि 28 सितंबर 1981 के हाईकोर्ट के आदेश द्वारा यह मामला विशेष रूप से संबंधित सत्र न्यायाधीश को स्थानांतरित किया गया था, इसलिए अधिकार क्षेत्र को लेकर कोई अवैधता नहीं थी।
- गवाह और मकसद: कोर्ट ने पाया कि हत्या का मकसद (Motive) स्पष्ट और मजबूत था। गवाहों के रिश्तेदार होने के आधार पर उनके बयानों को खारिज नहीं किया जा सकता। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर 25 चोटें पाई गईं, जो चश्मदीद गवाहों द्वारा बताए गए हथियारों (लाठी, फरसा, बल्लम) से मेल खाती थीं।
निष्कर्ष
अपील के लंबित रहने के दौरान आरोपी ज्ञानेंद्री और राम फेर की मृत्यु हो गई थी, इसलिए उनके खिलाफ मामला बंद कर दिया गया। जीवित अपीलकर्ताओं – राम नारायण और राम उगरा – के संबंध में कोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी और निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा की पुष्टि की।
कोर्ट ने आदेश दिया:
“अपीलकर्ता संख्या 1 राम नारायण और अपीलकर्ता संख्या 4 राम उगरा को आज से दो सप्ताह के भीतर संबंधित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया जाता है, जो उन्हें शेष सजा काटने के लिए जेल भेजेंगे।”
केस विवरण:
- केस टाइटल: राम नारायण और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील संख्या 492/1982
- कोरम: जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस जफीर अहमद
- अपीलकर्ताओं के वकील: आर.एस. शुक्ला, बृज मोहन सहाय, राज प्रिया श्रीवास्तव, राजेंद्र प्रसाद मिश्रा
- प्रतिवादी के वकील: सरकारी अधिवक्ता

