स्कूल सर्टिफिकेट की मौजूदगी में मेडिकल टेस्ट अनिवार्य नहीं; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के आदेश को रद्द किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक नाबालिग की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision) को स्वीकार करते हुए जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) और चिल्ड्रेन कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें स्कूल रिकॉर्ड होने के बावजूद उम्र निर्धारण के लिए ऑसिफिकेशन टेस्ट (Ossification Test) कराने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनी रूप से मेडिकल टेस्ट का सहारा केवल तभी लिया जा सकता है जब निर्धारित वैधानिक दस्तावेज उपलब्ध न हों।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला प्रदीप कोरी उर्फ प्रदीप हरिजन (नाबालिग) से संबंधित है, जिसका प्रतिनिधित्व उसके पिता कर रहे हैं। 11 मार्च, 2025 को जिला प्रतापगढ़ के थाना लीलापुर में उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 65 और 351(3) तथा पॉक्सो एक्ट, 2012 की धारा 3/4(2) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। उस पर एक नाबालिग लड़की के साथ दुर्व्यवहार और उसके परिवार को धमकी देने का आरोप था।

उम्र निर्धारण की प्रक्रिया के दौरान, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, प्रतापगढ़ के समक्ष दो दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। पहला, हाईस्कूल की अंकतालिका जिसमें जन्म तिथि 1 जनवरी 2010 दर्ज थी। दूसरा, कक्षा 5 का स्कॉलर रजिस्टर जिसमें जन्म तिथि 13 मई 2009 दर्ज थी। इन दस्तावेजों के बावजूद, बोर्ड ने मेडिकल टेस्ट का आदेश दिया, जिसे बाद में विशेष न्यायाधीश, पॉक्सो एक्ट ने भी बरकरार रखा।

पक्षों की दलीलें

पुनरीक्षणकर्ता (Revisionist) के वकील ने दलील दी कि बोर्ड का आदेश जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 94 का उल्लंघन है। उन्होंने तर्क दिया कि जब स्कूल प्रमाण पत्र उपलब्ध हों, तो कानून उन्हीं के आधार पर उम्र तय करने का निर्देश देता है।

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राज्य की ओर से पेश अपर सरकारी अधिवक्ता (A.G.A.) ने इस आधार पर आदेश का बचाव किया कि दो दस्तावेजों में जन्म तिथि अलग-अलग होने के कारण सही उम्र के निर्धारण के लिए मेडिकल टेस्ट आवश्यक था। हालांकि, उन्होंने धारा 94 के तहत निर्धारित वरीयता क्रम (Order of Preference) के कानूनी जनादेश पर असहमति नहीं जताई।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

न्यायमूर्ति मनीष कुमार ने जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम की धारा 94 में उल्लिखित साक्ष्यों की वरीयता का बारीकी से परीक्षण किया। हाईकोर्ट ने नोट किया कि कानून के तहत वरीयता का क्रम इस प्रकार है:

  1. स्कूल से प्राप्त जन्म प्रमाण पत्र या संबंधित बोर्ड द्वारा जारी मैट्रिकुलेशन प्रमाण पत्र।
  2. इसकी अनुपस्थिति में, नगर निगम या पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र।
  3. इन दोनों की अनुपस्थिति में ही ऑसिफिकेशन टेस्ट या अन्य मेडिकल टेस्ट के जरिए उम्र तय की जाएगी।
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धारा 94(iii) की व्याख्या करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि धारा 94 का खंड (iii) ‘केवल’ (Only) शब्द से शुरू होता है, जिसका अर्थ है कि अन्य आयु निर्धारण परीक्षण का सहारा केवल खंड (i) और (ii) में वर्णित किसी भी दस्तावेज की अनुपस्थिति में लिया जा सकता है, अन्यथा नहीं।”

हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि यदि दोनों स्कूल रिकॉर्ड्स में से किसी को भी आधार माना जाए, तो घटना के समय आरोपी की उम्र 16 वर्ष से कम ही बैठती है। ऐसी स्थिति में, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के पास मेडिकल टेस्ट का आदेश देने का कोई आधार नहीं था।

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फैसला

हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के आदेशों को त्रुटिपूर्ण पाते हुए उन्हें रद्द कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने नाबालिग को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। यह जमानत उसके प्राकृतिक अभिभावक (पिता) द्वारा व्यक्तिगत बांड और दो प्रतिभूतियों को भरने की शर्त पर दी गई है।

अदालत ने अभिभावक को निर्देश दिया है कि वह किशोर की उचित देखभाल करेंगे, उसे किसी भी आपराधिक गतिविधि या गलत सोहबत में नहीं जाने देंगे और सुनवाई की हर तारीख पर उसे अदालत में पेश करेंगे। साथ ही, अगले एक साल तक किशोर को अपने अभिभावक के साथ हर महीने की 10 तारीख को संबंधित जिला प्रोबेशन अधिकारी के समक्ष उपस्थित होना होगा।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: प्रदीप कोरी @ प्रदीप हरिजन (नाबालिग) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल रिवीजन नंबर 1470 ऑफ 2025
  • पीठ: न्यायमूर्ति मनीष कुमार
  • दिनांक: 25 मार्च, 2026

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