‘एक बात में झूठ, तो सब में झूठ’ का सिद्धांत भारत में बाध्यकारी नियम नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या मामले में आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 36 साल पुराने हत्या के एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि ‘फाल्सस इन ऊनो, फाल्सस इन ऑम्निबस’ (एक बात में झूठ, सब में झूठ) का सिद्धांत भारत में कानून का बाध्यकारी नियम नहीं है, बल्कि यह केवल सावधानी का एक नियम है। जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने अपीलकर्ता इस्लाम द्वारा दायर आपराधिक अपील को खारिज करते हुए सत्र न्यायालय के फैसले और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा।

मामले का संक्षिप्त विवरण और पृष्ठभूमि

यह अपील IV अपर सत्र न्यायाधीश, सहारनपुर द्वारा 17 जुलाई 1990 को पारित निर्णय के खिलाफ दायर की गई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, अपीलकर्ता इस्लाम और सह-अभियुक्त नसीम मृतका महमूदन् के भतीजे थे। दोनों पक्षों के बीच संपत्ति को लेकर विवाद था और आरोपी कथित तौर पर महमूदन् की जमीन हड़पना चाहते थे।

घटना 2 नवंबर 1987 की सुबह 6:00 बजे की है, जब महमूदन् शौच के लिए जा रही थीं। आरोप है कि इनाम इलाही के घेर के पास इस्लाम ने अपने साथियों अल्ताफ और यामीन के साथ मिलकर उन पर कुल्हाड़ी (पालकटी) से हमला कर दिया। उनकी चीख सुनकर वादी शरीफ अहमद (PW-1) और अन्य गवाह मौके पर पहुंचे और आरोपियों को महमूदन् को घसीटते और मारते हुए देखा। गवाहों को देखकर हमलावर भाग गए। कुल्हाड़ी के वार से गर्दन पर लगी चोटों के कारण महमूदन् की मृत्यु हो गई।

पुलिस ने शव से बीस कदम की दूरी पर खून से सनी कुल्हाड़ी, कपड़े और मिट्टी बरामद की। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चेहरे और गर्दन पर हड्डी कटने के साथ कई चोटें पाई गईं। ट्रायल कोर्ट ने इस्लाम को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत दोषी ठहराया, लेकिन PW-1 की गवाही के आधार पर अन्य सह-अभियुक्तों को बरी कर दिया, क्योंकि गवाह ने मुख्य हमलावर के रूप में केवल इस्लाम की भूमिका बताई थी।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने सजा को चुनौती देते हुए मुख्य रूप से निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए:

  1. एफआईआर में देरी: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि एफआईआर घटना के बाद विचार-विमर्श करके दर्ज कराई गई थी (Ante-timed)। उन्होंने बताया कि एफआईआर घटना के पांच दिन बाद यानी 7 नवंबर 1987 को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के पास पहुंची थी।
  2. गवाही में विरोधाभास: यह दलील दी गई कि PW-1 की गवाही और एफआईआर में विरोधाभास है। एफआईआर में चार हमलावरों का नाम था, जबकि गवाही में कहा गया कि केवल अपीलकर्ता ने ही कुल्हाड़ी से वार किया, जबकि अन्य ने मृतका को पकड़ रखा था।
  3. मेडिकल साक्ष्य: अपीलकर्ता ने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में “लैसरेटेड घाव” (Lacerated wounds) का उल्लेख है, जबकि कथित हथियार धारदार कुल्हाड़ी थी। डॉक्टर (PW-3) ने जिरह में स्वीकार किया था कि ये चोटें कुल्हाड़ी से नहीं आ सकतीं।
  4. सह-अभियुक्तों की रिहाई: यह तर्क दिया गया कि जब ट्रायल कोर्ट ने उसी साक्ष्य पर सह-अभियुक्तों के खिलाफ मामले को अविश्वसनीय माना, तो अपीलकर्ता को भी बरी किया जाना चाहिए था।
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राज्य की ओर से पेश अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA) ने इन तर्कों का खंडन करते हुए कहा कि चश्मदीद गवाहों (PW-1 और PW-2) की गवाही से मामला संदेह से परे साबित होता है। उन्होंने कहा कि बरामद कुल्हाड़ी पर मानव रक्त मिलना गवाहों के बयान की पुष्टि करता है और डॉक्टर ने बाद में घावों की प्रकृति के वर्णन में लिपिकीय त्रुटि स्वीकार कर ली थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और साक्ष्यों का गहनता से विश्लेषण किया।

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एफआईआर में देरी पर: कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि मजिस्ट्रेट तक एफआईआर देर से पहुंचने का मतलब है कि इसे बाद में तैयार किया गया। सुभाष और शिव शंकर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1987) के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए, बेंच ने कहा कि यदि जनरल डायरी (GD) में समय पर रवानगी दर्ज है, तो केवल मजिस्ट्रेट तक पहुँचने में देरी से एफआईआर को फर्जी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने माना कि पुलिस स्टेशन और मुख्यालय के बीच 48 किलोमीटर की दूरी देरी का कारण थी।

मेडिकल साक्ष्य पर: पोस्टमार्टम रिपोर्ट में “लैसरेटेड घाव” और कुल्हाड़ी के उपयोग के बीच विसंगति पर, कोर्ट ने डॉक्टर के स्पष्टीकरण को स्वीकार किया। डॉक्टर ने कोर्ट द्वारा पूछे जाने पर माना था कि उन्होंने गलती से चोटों को “लैसरेटेड” लिखा था, जबकि हड्डी कटने (Bone cuts) को देखते हुए उन्हें “इन्साइज्ड घाव” (Incised wounds) लिखा जाना चाहिए था, जो कुल्हाड़ी जैसे धारदार हथियार से ही संभव है।

गवाहों की विश्वसनीयता पर: कोर्ट ने PW-1 को विश्वसनीय गवाह माना। एफआईआर और बयान में अंतर पर, कोर्ट ने राजन बनाम हरियाणा राज्य (2025) के हालिया फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि तुच्छ मामलों पर मामूली विसंगतियां पूरी गवाही को खारिज करने का आधार नहीं हो सकतीं। कोर्ट ने कहा:

“चश्मदीद गवाह की गवाही को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि एफआईआर में अपराध में शामिल विभिन्न व्यक्तियों की भूमिका का गणितीय सटीकता के साथ वर्णन नहीं किया गया था।”

सह-अभियुक्तों की रिहाई और कानूनी सिद्धांत: कोर्ट ने ‘फाल्सस इन ऊनो, फाल्सस इन ऑम्निबस’ के सिद्धांत को लागू करने से सख्ती से इनकार किया। निसार अली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1957) का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“फाल्सस इन ऊनो फाल्सस इन ऑम्निबस भारत में लागू कानून का सिद्धांत नहीं है। यह केवल सावधानी का एक नियम है। भले ही साक्ष्य का एक बड़ा हिस्सा त्रुटिपूर्ण पाया जाए, यदि शेष साक्ष्य आरोपी के अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त है, तो अन्य सह-अभियुक्तों के बरी होने के बावजूद उसकी सजा बरकरार रखी जा सकती है।”

निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों में हस्तक्षेप का कोई पर्याप्त कारण नहीं है। कोर्ट ने धारा 302 आईपीसी के तहत अपीलकर्ता इस्लाम की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को सही ठहराया।

कोर्ट ने आदेश दिया:

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“अपीलकर्ता 25 फरवरी, 2026 तक ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करेगा और उसे ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा पूरी करने के लिए जेल भेजा जाएगा।”

इस प्रकार, अपील खारिज कर दी गई।

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: इस्लाम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील संख्या 1406 वर्ष 1990
  • बेंच: जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी
  • अपीलकर्ता के वकील: कामेश्वर सिंह, कृष्ण कांत शुक्ला, रमाशंकर मिश्रा
  • प्रतिवादी के वकील: डी.जी.ए. (D.G.A.)

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