इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक न्यायिक आदेश में नजीर (precedent) का हवाला देते समय सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों के नाम लिखने पर एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) को सख्त चेतावनी दी है। कोर्ट ने इस कार्यप्रणाली को “पूरी तरह से अनुचित” (totally uncalled for) करार देते हुए भविष्य में ऐसी गलती न दोहराने की हिदायत दी है।
यह अहम टिप्पणी न्यायमूर्ति समित गोपाल की पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए की। इस मामले में कोर्ट ने सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर पैसे के लेनदेन से जुड़े एक विवाद को खारिज करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि नौकरी के लिए रिश्वत देने का समझौता “अवैध” और “लोक नीति के विरुद्ध” (Against Public Policy) है।
न्यायिक शिष्टाचार और नजीर पेश करने का तरीका
हाईकोर्ट, पुनरीक्षण न्यायालय (Revisional Court) यानी अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, कोर्ट नंबर 13, मेरठ द्वारा 28 अगस्त, 2025 को पारित आदेश की समीक्षा कर रहा था। कोर्ट ने पाया कि निचली अदालत के जज ने अपने आदेश में एक केस लॉ (2024 (128) ACC 307) का हवाला देते हुए उस पीठ में शामिल सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों के नाम भी लिखे थे।
इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए न्यायमूर्ति समित गोपाल ने कहा:
“पुनरीक्षण न्यायालय की इस प्रणाली की सराहना नहीं की जा सकती। यह याद दिलाया जाता है कि निर्णयों का हवाला देते समय केवल उनका साइटेशन (citation), केस नंबर, पक्षकारों का नाम और निर्णय की तारीख के साथ संबंधित टेक्स्ट का उल्लेख किया जाना चाहिए। जबकि उक्त पृष्ठ पर पुनरीक्षण न्यायालय ने पीठ गठित करने वाले माननीय न्यायाधीशों के नामों का उल्लेख किया है। यह न्यायालय इसकी सराहना नहीं करता है और यह पूरी तरह से अनुचित (totally uncalled for) है।”
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि महानिबंधक (Registrar General) ने पहले ही 23 मई, 2025 को एक परिपत्र (circular) जारी कर सभी जिला न्यायाधीशों और पीठासीन अधिकारियों को इस प्रथा से बचने का निर्देश दिया था। यह निर्देश क्रिमिनल अपील संख्या 5764 ऑफ 2024 (मो. इफ्तिखार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) में पारित आदेश के अनुपालन में जारी किया गया था।
पीठ ने टिप्पणी की कि संबंधित जज इस निर्देश से “काफी अनजान” प्रतीत होते हैं।
प्रशासनिक निर्देश
हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया कि वे इस आदेश की प्रति जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मेरठ को भेजें और सीधे संबंधित अधिकारी को भी प्रेषित करें, ताकि वे भविष्य में सतर्क रहें। कोर्ट ने अधिकारियों को दो सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट भेजने का आदेश दिया है।
क्या था मुख्य मामला?
यह टिप्पणी प्रियंक कुमार द्वारा अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका की सुनवाई के दौरान आई। याची ने अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ), मेरठ के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनकी शिकायत (Complaint) खारिज कर दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि और आरोप: याची प्रियंक कुमार का आरोप था कि उनके रिश्तेदारों (विपक्षियों) ने उनके छोटे भाई अंकुर सिंह को मेरठ मेडिकल कॉलेज में क्लर्क की नौकरी दिलाने का झांसा देकर धोखाधड़ी की। आरोपों के मुताबिक, नियुक्ति के लिए 12 लाख रुपये की मांग की गई थी, जिसमें से याची ने 50,000 रुपये बैंक खाते में और लगभग 4 लाख रुपये नकद दिए। जब न तो नौकरी मिली और न ही पैसा वापस आया, तो उन्होंने कानूनी रास्ता अपनाया।
दलीलें और कोर्ट का फैसला
- याची का पक्ष: अधिवक्ता विपुल कुमार मिश्रा ने तर्क दिया कि विपक्षियों ने पैसा लेकर वापस नहीं किया, इसलिए आईपीसी की धारा 406 (अमानत में खयानत) और 420 (धोखाधड़ी) का अपराध बनता है।
- विपक्ष का तर्क: राज्य सरकार की ओर से एजीए और निजी विपक्षियों के वकील यश प्रताप सिंह ने दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि आरोप झूठे हैं और यह विवाद एक निजी रंजिश का परिणाम है। उनका मुख्य तर्क यह था कि नौकरी के लिए पैसे देने का कथित समझौता “लोक नीति के विरुद्ध” है और कानूनन मान्य नहीं है।
मेरिट पर निर्णय: न्यायमूर्ति समित गोपाल ने मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए कहा कि मुख्य आरोप अवैध तरीके से रोजगार प्राप्त करने के लिए पैसा देने का है।
याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:
“वर्तमान मामले में आरोप शिकायतकर्ता द्वारा अभियुक्त को पैसे देने का है, जो कि अवैध है; उक्त समझौता लोक नीति के विरुद्ध (against public policy) है।”
कोर्ट ने माना कि निचली अदालतों द्वारा पारित आदेश तर्कसंगत हैं और उनमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
केस का विवरण (Case Details)
- केस का नाम: प्रियंक कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 6 अन्य
- केस संख्या: मैटर्स अंडर आर्टिकल 227 नंबर 15555 ऑफ 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति समित गोपाल
- याची के वकील: आनंद मोहन पांडेय, विपुल कुमार मिश्रा
- प्रतिवादी के वकील: जी.ए. (राज्य सरकार), यश प्रताप सिंह

